हजारों वर्ष पहले मानव यह जान चुका
था कि ईश्वर उसके ही हृदय में निवास करते हैं, वही सर्वोच्च शक्ति का वाहक है, वही परमात्मा का अंश
है, जो परमात्मा का परिचय दे सकता है, वही है जो अनंत प्रेम बाँट सकता है, वही है जिसके लिए
परमात्मा ने इस सुंदर सृष्टि का निर्माण किया है, उसी के पास बुद्धि रूपी अस्त्र है,
ज्ञान रूपी अग्नि है. उसमें देवत्व की सारी सम्भावनाएं मौजूद हैं, पर उसको परम
स्वतंतत्रा भी है कि वह इन सबका उपयोग ऊपर उठने के लिए करे या नीचे गिरने के लिए. क्योंकि
उसमें दानव बनने की भी समस्त सम्भावनाएं हैं, वह स्वयं को दुखी भी बना सकता है और
चाहे तो परमपद भी पा सकता है, जहाँ शांति की अजस्र धारा बहती है.