जगत है, जीव है, ईश्वर है और... परमात्मा है. जगत वह जिसमें
सारे अनुभव होते हैं, जीव वह जो अनुभव करता है, ईश्वर वह जिसने इस जगत की रचना की
है, और परमात्मा.. वह जो इन तीनों का आधार है, तीनों उससे ही निकले हैं और उस पर
ही टिके हैं. जीव जब तक अनुभवों में रस लेता रहेगा, सुख—दुःख का भागी बना रहेगा.
ईश्वर अनंत ज्ञान से परिपूर्ण सत्ता है. उसे सुख-दुःख नहीं व्याप्ता. जगत जड़ है
उसे भी सुख-दुःख नहीं होता. जीव जब इस खेल से ऊब जाता है तो भीतर जाता है, कारण तलाशता
है. ईश्वर उसे ज्ञान देता है. अब जगत भी उसे मित्रवत जान पड़ता है. इसके बाद परमात्मा
उससे दूर नहीं है.
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Wednesday, February 28, 2018
Wednesday, February 14, 2018
प्रेम ही पूजा प्रेम अर्चना
१४ फरवरी २०१८
आज प्रेम दिवस है. प्रेम इस संसार के मूल में है, प्रेम पर यह
सृष्टि टिकी है और प्रेम से ही यह बनी है. ईश्वर प्रेम है और उसने प्रेम के
आदान-प्रदान के लिए ही इतने जीवों का निर्माण किया है. नन्हा सा पौधा हो या छोटा
सा प्राणी..प्रेम की भाषा उन्हें भी आती है. हम मानवों ने तो प्रेम के परम रूप को
चखा है, मीरा और चैतन्य की भक्ति प्रेम की पराकाष्ठा है. भक्ति प्रेम का ही
श्रेष्ठतम रूप है. ऐसा प्रेमी जो अपने प्रियतम से कभी मिला ही नहीं, उसे कभी देखा
भी नहीं पर फिर भी उस पर सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार है, प्रेम की जिस ऊँचाई
पर विराजमान होगा सामान्य जन उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. वात्सल्य, स्नेह और
राष्ट्र के प्रति प्रेम भी इसी प्रेम की भिन्न अभिव्यक्तियां हैं. जिस हृदय में भी
किसी भी तरह के प्रेम का अंकुर एक बार भी फूटा है, वह एक न एक दिन उस परम प्रेम का
स्वाद अवश्य चखेगा.
Monday, September 10, 2012
मन हो जैसे खुला गगन
मन की कामनाओं की
पूर्ति के लिए हम परिस्थितियों के गुलाम बन जाते हैं, सब कुछ होते हुए भी अभाव का
अनुभव करते हैं, किसी के पास भोजन हो, वस्त्र हों, और घर हो फिर उसे क्या चाहिए, लेकिन
मन इच्छाएं खड़ी किये जाता है और उसमें जो बाधा डालता है उस पर क्रोध जगाता है, सूक्ष्म
अहंकार भी उसमें सम्मिलित होता है. हमें खुद पर इतना तो वश होना ही चाहिए कि
वस्तुओं को उसके सही उपयोग की दृष्टि से ही आंकें. जिसका मन कभी खाली होता ही नहीं
तो तन रूपी घर में रहने वाली आत्मा को कहाँ स्थान मिलेगा, वह सिकुड़ कर रहने के लिए
विवश हो जाती है. जैसे ही हम अपनी सूक्ष्मतम भावनाओं के प्रति सजग हो जाते हैं,
अनावश्यक अपने आप झर जाता है. मन खाली होने लगता है. तब हम ईश्वर की उपस्थिति को
महसूस करने लगते हैं.उसकी याद ही मन को व्यर्थ की कामना में उलझने से बचाती है.
ज्ञान भी तभी भीतर टिकता है. अखंड शांति का भाव जगता है.
Friday, August 19, 2011
ईश्वरीय प्रेम
अक्तूबर २००१
निशब्द परमात्मा तक पहुंचने के लिए शब्दों की एक नाव बनानी पडती है, पर अंततः शब्द भी छूट जाते हैं क्योंकि वह शब्दातीत है. हमारे मन में असीम सामर्थ्य है जो हम चाहें उसे वह अनुभूत करा सकता है, मन की वृत्ति में यदि ईश्वरीय प्रेम हो तो वही प्रगट होगा, यह भाव सतत बना रहे तो ईश्वर हमारे मन का स्वामी बन जाता है, उसी का अधिकार हृदय पर हो जाता है और इसके बाद समता स्वयं ही प्राप्त हो जाती है. ईश्वर की समीपता का अनुभव करते हुए मन में जो नकारात्मक विचार आयें उन्हें ठहरने न देना और जो सकारात्मक विचार आयें उन पर ही ध्यान केंद्रित करने से समरसता बनी ही रहती है.
Tuesday, August 9, 2011
सहज ध्यान
अगस्त २००१
यह जीवन जो हमें ईश्वर से उपहार स्वरूप मिला है, उसी का दिया है, वही इसे चलाता, पोषता और सम्भालता है. फिर भी हम कहते हैं उसके लिए हमारे पास समय नहीं है. सारा समय तो उसी का है. उसको पाना कितना सरल है., कितना सहज जैसे श्वास लेना लेकिन हम ढंग से श्वास भी तो लेना नहीं जानते. उथली श्वास लेते हैं जो उथले विचारों को दर्शाती है. श्वास के प्रति जागरूक रहकर हम वर्तमान में रह सकते हैं अन्यथा भूत या भविष्य की कल्पनाएँ हमारा पीछा नहीं छोडती. यह सहज ध्यान है.
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