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Wednesday, February 22, 2017

स्वयं के निकट देह से दूर

२२ फरवरी २०१७ 
उपवास का वास्तविक अर्थ है स्वयं के निकट निवास करना, अर्थात देह से पृथक भीतर की चेतना के निकट वास करना. जब साधक अपने पास रहने की कला सीखना चाहता है तो ध्यान के द्वारा प्रसाद रूप में पाया उपवास इसमें सहायक है. भीतर यह भान होने लगता है  कि भूख देह को लगती है आत्मा इसे देखने वाला साक्षी मात्र है, भोजन आवश्यक है पर इसके प्रति आसक्ति आवश्यक नहीं है. साधक जब उपवास को सही अर्थों में समझने के बाद ही इसे करने का व्रत लेता है तो स्वयं को आत्मा के निकट सहज ही  पाता है. स्वयं का होना ही उसे पर्याप्त लगता है. जब देह का स्मरण ही नहीं आता तब ही सच्चा उपवास घटता है. मन में तरह-तरह के व्यंजनों को खाने की इच्छा हो और उपवास के नाम पर उनका सेवन हो तो आत्मा से दूरी बढ़ जाएगी और मन देह में ही वास करेगा. 

Wednesday, October 22, 2014

जाग गया जब कोई भीतर

मार्च २००७ 
उपवास का अर्थ है निकट बैठना, उसके निकट जो भीतर है, प्रकाश, पावनता, सत्य और दिव्यता का जो स्रोत है. यानि हमारी आत्मा ! उसके पार ही तो परमात्मा है. मानव होने का जो सर्वोत्तम लाभ है वह यही कि वह स्वयं को जाने, जिसे जानने के बाद यह सारा जगत होते हुए भी नहीं रहता. साधक सभी कुछ करता है पर भीतर से बिलकुल अछूता रहते हुए. सब नाटक सा लगता है, कुछ भी असर नहीं करता. वह इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ जाता है. जीना तब सहज होता है, कोई अपेक्षा नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना भी नहीं. कहीं जाना भी नहीं, कहीं से आना भी नहीं. खेल करना है बस. जगना, सोना, खाना, पीना सब कुछ खेल ही हो जाता है. परमात्मा जो कभी दूर-दूर लगता था अपने सबसे करीब हो जाता है. वही अब खुद की याद दिलाता है. जो जन्मों से सोया हुआ था वह जाग जाता है. शास्त्र घटित होते हुए लगते हैं, उनकी बातें अक्षरशः सही लगती हैं. ऐसी मस्ती और तृप्ति में कोई नाचता है तो कोई हँसता है, कोई मुस्कुराता भर है !

Saturday, August 16, 2014

कर्ता है जो वही भोक्ता

जनवरी २००७ 
उपवास, जप, तप, ध्यान, भक्ति आदि शुभ क्रियाएं हैं किन्तु इन्हें करते समय मन का भाव कैसा है इसका भी ध्यान रखना होगा, यदि मन में अभिमान जगता है तो फल विपरीत हो जाता है. क्रियाएं स्थूल हैं और उनके करने से प्रशंसा के रूप में उसका स्थूल फल तो हमें मिल ही जाता है. प्रशंसा से हम अभिमानी हो जाते हैं और शुभ कर्म पुण्य नहीं देता. शुभ कर्म तो हमारे पूर्व के कर्मों के फल रूप में हमें प्राप्त होते हैं, किन्तु कर्ता होकर यदि हम ध्यान आदि करते हैं तो यह कर्म बंधन कारी है. कर्मों की निर्जरा अर्थात कर्मों की समाप्ति धार्मिक कृत्यों से नहीं होती है. आत्मा में स्थित रहकर जो स्वयं को कर्ता नहीं मानता है, कर्म तो उसके ही कटते हैं. क्रोध, मान, माया, लोभ, अहंकार का यदि लेशमात्र भी रहे तो हम नीचे ही जाते हैं. 

Monday, September 2, 2013

स्वयं के पास हुआ सो मुक्त

फरवरी-२००५  
‘उपवास’ का अर्थ है ईश्वर के निकट वास करने का दिन, अपने आप में रहने का दिन, एकत्व को अनुभव करने का दिन, इसको अनुभव के स्तर पर जीने का दिन, जहाँ कोई भेद न हो वहाँ शांति होती है, जहाँ दो हुए वहाँ से दुखों का आरम्भ होता है. शांति से सामर्थ्य का जन्म होता है तब जो कर्म हम करते हैं वे बांधते नहीं. प्रकृति के गुण गुणों में बरत ही रहे हैं, इन्द्रियां अपने सहज स्वाभाविक धर्म के अनुसार कार्य कर रही हैं, हम शुद्ध, बुद्ध निर्मल ऊर्जा के पुंज हैं, यह भाव आज के दिन तो होना चाहिए और यही सत्य है. हम स्वयं ही असत्य के पीछे दौड़ते हैं,, फिर धोखा खाने पर दुखी होने का नाटक करते हैं, इसलिए इस जगत को माया जाल कहा गया है. यहाँ मानव स्वयं ही जाल बनाता है, उसमें फंसता है फिर छूटने का प्रयत्न करते हुए स्वयं को अपनी वीरता पर शाबाशी अथवा तो अपनी निरीहता पर संवेदना देता है. स्वयं पर दया दिखाता है या कठोर होता है, जबकि सारा खेल उसी का रचा हुआ है. इसी खेल को खेलते–खेलते कितनी सदियाँ कितने जन्म गुजर जाते हैं.  

Wednesday, December 21, 2011

उपवास कैसा हो


अगस्त २००२ 
आज एकादशी है, यानि पाक्षिक उपवास का दिन. सही मायने में उप-वास (निकट वास ) तभी होगा जब मन भगवद् भाव से परिपूर्ण रहे, यानि ईश्वर के निकट वास करे. भगवद् प्रेम की एक बूंद भी मन को भरने के लिये पर्याप्त है, वही मन जो संसार भर की वस्तुएं पाकर भी अतृप्त ही रहता है. ईश प्रेम में पूर्णता है, ज्ञान और आनंद का स्रोत भी वही है. उसका विस्मरण ही विकारों को हम पर अधिकार करने में सक्षम बनाता है, वरना तो दुःख हमें छू भी नहीं सकता. ऐसा प्रेम यदि हृदय में हो तो सृष्टि में कुछ भी अनचाहा नहीं रह जाता. सभी अपने हो जाते हैं. सभी के प्रति यदि समता का भाव रहेगा तो विषाद का स्थान कहाँ है ? न बाहर न भीतर, क्योंकि दोनों जगह तो वही है.


Saturday, August 20, 2011

उपवास


अक्तूबर २००१ 

उपवास के दिन जीवनी शक्ति सुव्यवस्थित होती है, उपवास का अर्थ है आत्मा के निकट रहना. शरीर व मन को इससे लाभ होता है, यदि यह लाभ भी ईश्वर अर्पण कर दें तो विशेष लाभ होता है. क्योंकि जीवात्मा परमात्मा का सनातन अंश है, जो कण-कण में व्याप्त है जो घट-घट में बोल रहा है जो स्वयं चेतन है पर जडरूप में प्रकट हुआ है, उसी की एक मात्र सत्ता है वही हमारा अपना आप है जिसे ढूँढने हमें कहीं जाना नहीं है बस मन को उसके साथ संयुक्त रखना है, मन का मूल वही है सो उपवास के दिन मन को अपने आप में टिकाये रखने का अभ्यास करना है. उपवास का अर्थ यही है.