होली का उत्सव मनों में कितनी उमंग जगाता है, सारा वातावरण जैसे मस्ती के आलम में डूब जाता है. प्रकृति भी अपना सारा वैभव लुटाने को तैयार रहती है. बसंत और फागुन की मदमस्त बयार बहती है और जैसे सभी मनों को एक सूत्र में बांध देती है. उल्लास और उत्साह के इस पर्व पर कृष्ण और राधा की होली का स्मरण हो आना कितना स्वाभाविक है. कान्हा के प्रेम के रंग में एक बार जो भी रंग जाता है वह कभी भी उससे उबर नहीं पाता. प्रीत का रंग ही ऐसा गाढ़ा रंग है जो हर भक्त को सदा के लिए सराबोर कर देता है. मन के भीतर से सारी अशुभ कामनाओं को जब होली की अग्नि में जलाकर साधक खाली हो जाता है अर्थात उसका मन शुद्ध वस्त्र पहन लेता है तो परम उस पर अपने अनुराग का रंग बरसा देता है. अंतर में आह्लाद रूपी प्रहलाद का जन्म होता है, विकार रूपी होलिका भस्म हो जाती है और चारों ओर सुख बरसने लगता है. होली का यह अनोखा उत्सव भारत के मंगलमय गौरवशाली अतीत का अद्भुत भेंट है.
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Wednesday, March 16, 2022
Friday, February 4, 2022
जीवन में छाए वसंत जब
मन की धारा यदि भीतर की ओर मुड़ जाये तो राधा बन जाती है इसी तरह मन की हजारों वृत्तियाँ गोपियाँ क्यों नहीं बन सकतीं। हमारी ‘आत्मा’ ही वह कृष्ण है जिसे रिझाना है. जीवन का कोई भरोसा नहीं है, श्वास रहते-रहते उस तक जाना है, जाना है, कहना भी ठीक नहीं, वह तो सहज प्राप्य है. मध्य में जो आवरण है उसे हटाना है. संसार से सुख पाने की कामना का त्याग करना है, तभी सहज प्राप्त सुख दीखने लगेगा. एक ही निश्चय रहे तो सारी ऊर्जा उस एक की तरफ बहेगी. एक ही व्रत हो और एक ही लक्ष्य कि भीतर के प्रकाश को बाहर फैलाना है. जिसके आने पर जीवन में बसंत छा जाता है. सद्विचारों के पुष्प खिल जाते हैं और प्रीत की मंद बयार बहने लगती है. जैसे वसंत में दिन-रात समान हो जाते हैं, वैसे ही भीतर हानि-लाभ समान हो जाते हैं.
Thursday, August 22, 2019
कृष्ण, कन्हैया, माधव, केशव
कृष्ण का नाम याद आते ही मन में
स्मृतियों का एक अनंत भंडार खुल जाता है. याद हो आती हैं गोपियाँ और ग्वाल-बाल, नंद-यशोदा,
गोकुल और वृन्दावन. मथुरा की जेल में कैद देवकी और टोकरी में नन्हे कान्हा को उठाये
यमुना पार करते वसुदेव भी याद आते हैं. कदम्ब का पेड़ और बांसुरी की तान भी देश के लोकमानस
में इस तरह रची-बसी है कि कहीं भी, कोई भी बांसुरी बजाये, कृष्ण की स्मृति मन को
तरंगित कर जाती है. ब्रजभूमि का तो हर रजकण कृष्ण के स्पर्श को भीतर धारण किये हुए
है. पूतना और बकासुर के नाम भी कृष्ण से वैसे ही जुड़े हैं जैसे सुदामा और उद्धव के.
कृष्ण अर्जुन के सखा हैं और भीष्म पितामह के आराध्य भी, द्रौपदी के तारणहार हैं तो
रुक्मणी के प्रिय द्वारकाधीश. राधा का नाम तो कृष्ण के साथ एक हो गया है, उसे अलग
से गिनाने की भी जरूरत नहीं है. भारत उसी तरह कृष्णमय है जैसे उपवन में सुगंध हो
या दीपक में ज्योति. चित्रकला, संगीत, वास्तुशिल्प, साहित्य या अन्य कोई भी विधा
हो कृष्ण के बिना कोई भी पूर्ण नहीं होती. महाभारत को गीता रूपी रत्न से सुशोभित
करने वाले कृष्ण का आज जन्मदिन है. यही प्रार्थना है कि जन्माष्टमी का यह पर्व भारत
के सुन्दर भविष्य की नींव रखने वाला सिद्ध हो.
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Saturday, March 11, 2017
रंग चढ़े न दूजा कोई
१२ मार्च २०१७
होली का उत्सव मनों में कितनी उमंग जगाता है, सारा वातावरण जैसे मस्ती के आलम में डूब जाता है. प्रकृति भी अपना सारा वैभव लुटाने को तैयार रहती है. बसंत और फागुन की मदमस्त बयार बहती है और जैसे सभी मनों को एक सूत्र में बांध देती है. उल्लास और उत्साह के इस पर्व पर कृष्ण और राधा की होली का स्मरण हो आना कितना स्वाभाविक है. कान्हा के प्रेम के रंग में एक बार जो भी रंग जाता है वह कभी भी उससे उबर नहीं पाता. प्रीत का रंग ही ऐसा गाढ़ा रंग है जो हर भक्त को सदा के लिए सराबोर कर देता है. मन के भीतर से सारी अशुभ कामनाओं को जब होली की अग्नि में जलाकर साधक खाली हो जाता है अर्थात उसका मन शुद्ध वस्त्र पहन लेता है तो परम उस पर अपने अनुराग का रंग बरसा देता है. अंतर में आह्लाद रूपी प्रहलाद का जन्म होता है, विकार रूपी होलिका भस्म हो जाती है और चारों ओर सुख बरसने लगता है. होली का यह अनोखा उत्सव भारत के मंगलमय गौरवशाली अतीत का अद्भुत भेंट है.
Tuesday, May 6, 2014
ज्योति प्रीत की जलती भीतर
जनवरी २००६
मन की धारा यदि भीतर की
ओर मुड़ जाये तो राधा बन जाती है इसी तरह मन की हजारों वृत्तियाँ गोपियाँ क्यों
नहीं बन सकतीं, हमारी ‘आत्मा’ ही वह कृष्ण है जिन्हें रिझाना है. जीवन का कोई
भरोसा नहीं है, श्वास रहते-रहते उस तक जाना है, जाना है, कहना भी ठीक नहीं, वह तो
सहज प्राप्य है. मध्य में जो आवरण है उसे हटाना है. संसार से सुख पाने की वासना का
त्याग करना है, तभी सहज प्राप्त सुख दीखने लगेगा. एक ही निश्चय रहे तो सारी ऊर्जा
उस एक की तरफ बहेगी. एक ही व्रत हो और एक ही लक्ष्य, भीतर के प्रकाश को बाहर
फैलाना. जिसके आने पर जीवन में बसंत छा जाता है. सद्विचारों के पुष्प खिल जाते हैं
और प्रीत की मंद बयार बहने लगती है. जैसे वसंत में दिन-रात समान हो जाते हैं, वैसे
ही भीतर हानि-लाभ समान ही हो जाते हैं.
Wednesday, May 15, 2013
राधे राधे मन बोले
सितम्बर २००४
गोपियों ने कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण किया था पर राधा ने स्वयं
का विसर्जन कर दिया है. राधा के प्रेम में चीत्कार नहीं है वह स्वयं को मिटा कर कृष्णरूप
ही हो गयी है. कृष्ण से वह जब पृथक रही ही नहीं तो कैसा विरह और कैसी पीड़ा.
विसर्जन करना बहुत कठिन है, अपने अहम् का विसर्जन, शक्ति, समय, सेवा का विसर्जन, प्रिय
के साथ एकाकार हो जाना, द्वैत को मिटाकर एक्य स्थापित करना प्रेम की पराकाष्ठा है.
भक्त भगवान को स्वयं से अलग मानकर उसकी पूजा करता है, अपनी निजता बचाए रखता है पर
ज्ञानी भक्त स्वयं को मिटा देता है, उसके लिए दो नहीं रहते वह इतनी भी दूरी नहीं चाहता. किन्तु सेवा की यह
भावना किसी बिरले को ही प्राप्त होती है. जन्मों के संस्कार हमें अहंकार से मुक्त
होने नहीं देते, अहंकार इतना सूक्ष्म है कि कब आकर खड़ा हो जाता है पता ही नहीं
चलता. कृपा के अधिकारी बनने पर ही इससे मुक्त हुआ जा सकता है. सजगता ही कृपा पाने
की शर्त है.
Thursday, January 17, 2013
राधे राधे मन बोले
जनवरी २००४
राधा कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है, महामाया और योगमाया उसकी अपरा और परा शक्तियाँ
हैं. कृष्ण सोलह कलाओं से पूर्ण तथा षट्ऐश्वर्य
सम्पन्न हैं, वह अपने एक अंश से इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड को धारण किये हुए हैं, जीव
उनकी पराशक्ति का अंश है पर माया ने उसे मोहित कर लिया है और वह स्वयं को
सर्वेसर्वा मानने लगता है, यही अहंकार उसके जीवन में दुखों को लाता है. यदि वह
अपने सत्य स्वरूप को जान ले तो जीवन कितना सहज और आनन्दपूर्ण हो सकता है. वही दिन
सार्थक होगा जब कृष्ण का अनुभव हमारा अपना अनुभव होगा, लेकिन उस परम दिन के लिए
सत्प्रयास करते हुए ये दिन भी क्या कम सार्थक हैं. यात्रा का भी अपना एक आनंद है,
जितना मंजिल का. मार्ग में आने वाले मनोरम दृश्य मन की उस अवस्था की तरह हैं जो
हमें साधना का दौरान प्राप्त होती हैं. यह निर्विचार, निर्विकल्प अवस्था कितनी
शांत अवस्था है, जब कोई इच्छा नहीं, बस एक होने मात्र का अहसास ही रहता है. फिर यह
होता है की एक मुस्कान न जाने कहाँ से आ जाती है, भीतर जो आह्लाद सा जगता है यही
तो राधा है अर्थात कृष्ण के प्रति प्रेम जो हमें सहज बनाता है.
Sunday, September 16, 2012
कहते हैं किसको मुक्ति
अगस्त २००३
आजादी का अर्थ क्या है, आजादी यानि हमारे मन की आजादी, कोई बंधन नहीं, पूर्ण मुक्त,
जीवन मुक्त, न इच्छाओं का बंधन न कामनाओं का, न लोभ का, न मोह का न ईर्ष्या का न
अहंकार का. हम हैं ही क्या इस विशाल ब्रह्मांड के सम्मुख और हममें या अन्य किसी
में अंतर ही क्या है तो हम किसका अहंकार करें और किससे ईर्ष्या करें. यह जगत हमें दे ही क्या सकता है
जो हमारे पास पहले से ही नहीं है, तो हमें लोभ भी क्यों हो. कौन यहाँ पूर्ण है तो
क्रोध किस पर करें. जब हम ही अपूर्ण हैं तो हमें क्या अधिकार है कि क्रोध करें.
यही सारे विकार ही तो हैं जो हमें गुलाम बनाते हैं. सद्गुरु हमें आजाद करते हैं, सारे
बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं. हम बिन पंखों के मुक्त गगन में उड़ने लगते हैं. हम उस
देश के वासी हैं जहां रोग नहीं, शोक नहीं, आनंद ही आनंद है. जहां करुणा है, प्रेम
है, जहां अपनत्व है, जहां अद्वैत है, जो ब्रह्म का देश है, जो कृष्ण का वृन्दावन
है, गोकुल है, जहां प्रेम की वंशी बजती है. जहां विकारों के असुरों का कृष्ण नाश कर
देते हैं. जहां अंतर में मन की राधा का मन के कृष्ण से निरंतर मिलन होता है. ऐसी
मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है जिसे एक बार पाने के बाद पुनः हमें गुलाम नहीं बनना
है. मुक्ति का एक बार स्वाद जो ले ले फिर उसे सोने की जंजीरें भी बांध नहीं पाएंगी
वह तो अमृत पान कर चुका है फिर क्यों पोखर के पास जायेगा. संत तभी हमें साधना,
सेवा, सत्संग और स्वाध्याय के मार्ग पर चलने का परामर्श देते हैं, यही पथ मुक्ति
का पथ है.
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