Tuesday, January 31, 2012

परम खजाना


नवंबर २००२ 
रामरस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती. परम प्रेम हमारा स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर हम संसार में आसक्त होते हैं. कृष्ण का सौंदर्य, शिव की सौम्यता, और राम का रस जिसे मिला हो वही धनवान है. जिस प्रकार धरती में सभी फल, फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है वैसे ही उस परमात्मा में सभी सदगुण, प्रेम, बल, ओज, आनंद व ज्ञान छिपा है, संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उस में है तो यदि हम स्वयं को उससे जोड़ते हैं, प्रेम का संबंध बनाते हैं तो वह हमें इस शुभ से मालामाल कर देता है, दुःख हमसे स्वयं ही दूर भागता है, मन स्थिर होता है. धीरे धीरे हृदय समाधिस्थ होते हैं. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता...दिव्य आनंद हमारे साथ होता है और तब यह जीवन एक उत्सव बन जाता है.

वह कौन है


परमात्मा हमारा जीवन धन है, हमारा सर्वस्व, हमारे अस्तित्त्व का प्रमाण, वह हमारा हितैषी है. शुभचिंतक और सुहृदयी. वह हमारी अंतरात्मा है. भक्त के पोर-पोर में उसका नाम अंकित है, उसके प्रति वह अपने भीतर इतना प्रेम उमड़ते महसूस करता है कि उसकी गूंज तक उसे सुनाई पड़ती है. उसका नाम लेते ही आँखें नम हो जाती हैं. वह प्रियतम है, अनुपम है और मधुमय है. वही जानने योग्य है. एक उसी की सत्ता कण-कण में व्याप्त है, वही चैतन्य हर जड़-चेतन में समाया है. उसी का प्रकाश सूर्य आदि नक्षत्रों में है और उसी का प्रकाश है जो आँखें बंद करते ही उसे घेर लेता है. 

Monday, January 30, 2012

परम पुकारे अपनी ओर


अक्तूबर २००२ 
यह जगत प्रतिपल बदल रहा है. मनुष्य किसी भी स्थिति में क्यों न हो हँसी और खुशी उसका साथ नहीं छोड़ती जैसे दुःख उसका चिर साथी है. दोनों आते-जाते रहेंगे भिन्न भिन्न रूपों में, पर एक तो वही है अपना आप, जिसे न दुःख व्याप्ता है न सुख, जो प्रेम है, आनंद है, और मधुमय है, रसमय  है. जो जीवन को अर्थ देता है, एक चुनौती देता है, लक्ष्य देता है. जो बाहें फैलाये खड़ा है हमें हर पल पुकारता है. जो अपना दिव्य स्वरूप धारे हमें अपनी ओर आकर्षित करता है उसका जैसा बनने की हमें प्रेरणा देता है. वह हमें खुद सा बनाना चाहता है बल्कि उसने हमने खुद सा बनाया ही था, निष्पाप, निर्दोष..पर हम ही उससे दूर चले गये और जगत नाम की उस वस्तु को थामने लगे जो हाथ से मुट्ठी से रेत की तरह फिसलती जाती हैं, हमारा तन जो दिन रात जरा की ओर बढ़ रहा है, कोई न कोई व्याधि इसे सताती ही है, हमारा मन जो सदा किसी न किसी ताप में जलता ही रहता है. और वह शीतल फुहार सा, अलमस्त झरने सा, प्रेम का सोता हमारे भीतर ही कहीं बह रहा है उससे हम अनजान ही बने रहते हैं. 

Friday, January 27, 2012

जीवन उत्सव है


पत्रं पुष्पं फलं तोयं......श्रद्धा रूपी पत्र तथा मन रूपी पुष्प, हमारे कर्मों का फल रूपी फल और अपने अंतर का प्रेम भरा अश्रुजल यही तो हमें कृष्ण को अर्पित करना है. कृष्ण प्रेम का दूसरा नाम है, उसे प्रेम करो तो वह हजार गुणा करके लौटाता है. उसकी ओर जो एक बार चल दे उसे वह भटकने नहीं देता, किसी न किसी तरह अपनी ओर बुला ही लेता है. उसके सम्मुख जाते ही अपना सब कुछ उसे अर्पित करने का मन होता है बल्कि अपना कुछ है ही नहीं यह भाव उदित होता है. और तब यह भी पता चलता है कि हमारे भीतर ही ज्ञान है, प्रेम है, शक्ति है, ऊर्जा है, साहस है....सब कुछ अकारण है जैसे ईश्वर के पास इन सबका भंडार है...अकारण, वह लुटा रहा है. वही भीतर से सामर्थ्य देता है, प्रेरणा देता है, निर्देश देता है. जीवन तब उत्सव बन जाता है.  

Thursday, January 26, 2012

पायी संगत जो संतन की पायी पूंजी अपने मन की


अक्तूबर २००२ 
साधक की एक अनुभूति ऐसी भी होती है जब वह कह उठता है...“पायी संगत जो संतन की पायी पूंजी अपने मन की” सदगुरु ने हमें स्वयं से मिला दिया है और अब हमें स्वयं से प्रेम हो गया है. पहले स्वयं से आँखें मिलाते से डरते थे और दूसरों से भी, अब हर जगह वही दिखता है तो डर किसे और किसका? हमने स्वयं ही अपने लिये बाधाएं खड़ी की हुई थीं और ज्ञान से इन बाधाओं का अंत होता नजर आता है. तन, मन व बुद्धि को स्वयं से अलग देखने की कला ने हमारे सच्चे स्वरूप को उजागर कर दिया है. बुद्धि को पृथक करते ही वह आग्रह तज देती है, मन को तज देने से वह खाली हो जाता है और जैसे खाली घट में जल भर जाता है, खाली मन उस परम की शांति से स्वतः ही भर जाता है. तन को पृथक देखने पर उसकी पीड़ा छूती नहीं उस तरह जैसे पहले छूती थी. कितना अद्भुत है यह ज्ञान.  

तत्त्वमसि श्वेतकेतु !


तत्व ज्ञान जब जीवन में उतरता है तो स्वयं को एक ऊँची स्थिति में हम पाते हैं, जहाँ से अपने-पराये का भेद नहीं दिखता तो राग-द्वेष कैसा...? वस्तुओं और व्यक्तियों पर पर आधारित सुख-दुःख तब बच्चों का खेल लगता है. मन एक निरंतर बहने वाली धारा में भीगता रहता है. इसके लिये ईश्वर से उसकी भक्ति ही मांगनी है, प्रेम का सूर्य जब हृदय में जगमगाता है तो भीतर का अंधकार  मिटने लगता है, तत्क्षण मिट जाता है. श्रुति, स्मृति व शास्त्र के द्वारा प्राप्त किया ज्ञान व्यवहार के लिये आवश्यक है पर नित्य ज्ञान स्वयं को जानना ही है. देह व मन से परे स्वयं का पल भर का अनुभव ही भीतर परिवर्तन लाता है. 

Tuesday, January 24, 2012

मध्य मार्ग ही उत्तम है


अक्तूबर २०१२ 
कर्म और ज्ञान दोनों में समन्वय होना चाहिए. प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के मध्य का मार्ग अपनाकर ही हम योग साधना कर सकते हैं. सदगुरु न तो हमें भोग की ओर ले जाते हैं न त्याग की ओर, वे हमें त्याग करते हुए भोग की बात बताते हैं. वे जटिल प्रश्नों का कितना सरल हल बताते हैं. भक्ति व ज्ञान का समन्वय हो तो हम अहंकार व अकर्मण्यता दोनों से मुक्त रहेंगे. भक्ति में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, ज्ञान होने पर स्वयं को आत्मा जानकर हम उससे समानता का अनुभव करते हैं. वह और हम दो नहीं हैं, जुदा नहीं हैं, सदा से एक हैं, दोनों अविनाशी, शाश्वत, ज्ञान व प्रेम स्वरूप. उसे खोजने कहीं दूर नहीं जाना है. पहले भक्ति के द्वारा हृदय को शुद्ध करना है, चित्त को निर्मल करना है फिर वह हमें उसी तरह प्राप्त होगा जैसे हवा और धूप...सहज ही. एक एक कर दोषों को निकालने की बजाय एक ही बात करनी है उसका स्मरण... प्रतिपल वह याद रहे तो हम गलत कार्य की ओर उन्मुख ही न हों.