वर्तमान युग में मानसिक अवसाद और तनाव के मामले बहुत बढ़ रहे हैं। यदि गहराई से देखें तो मन के सारे तनाव का मूल स्रोत व्यक्ति का असंतोष है। एक व्यक्ति सदा कुछ न कुछ और बनने की कोशिश करता रहता है। वह स्वयं जैसा है उसे स्वीकार नहीं करता, इसी कारण वह दूसरे के अस्तित्व को भी नकारता है।उसका मन सदा किसी आदर्श स्थिति को पाने की कल्पना करता है। इसलिए तनाव सदा इस बात के कारण होता है कि वास्तव में वह क्या है और क्या बनना चाहता है।व्यक्ति के पास जो आज है, वह उससे क़तई खुश नहीं है और वह पाना चाहता है, जो नहीं है। मन का स्वभाव ही द्वंद्वात्मक है, मन स्वयं का विरोधी है।किसी भी बिंदु पर अपने स्वभाव के कारण मन एकमत नहीं होता। यह हमेशा बंटा हुआ होता है। अगर व्यक्ति मन की बात मानकर एक काम करता है तो मन का दूसरा हिस्सा कहता है, यह काम सही नहीं था। अगर वह इस हिस्से की बात सुने, तो दूसरा हिस्सा कहता है, यह अस्थिरता ठीक नहीं है। मन न इस तरफ रहने देता है, न ही उस तरफ। व्यक्ति अपने भीतर सदा एक सवाल का सामना करता है, और उसकी सारी शक्ति अपने भीतर के इस तनाव से स्वयं को बचाने में ही खर्च होती रहती है ।इस तनाव से बचाने का उपाय है, व्यक्ति स्वयं को जैसा वह है, पूर्ण रूप से स्वीकार करे। जब कोई ख़ुद को स्वीकारता है तभी दूसरों को भी, जैसे वे हैं, स्वीकार सकता है। इससे उसके भीतर बहुत सी ऊर्जा बच जाती है, जिसका उपयोग वह अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए कर सकता है।
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Tuesday, June 4, 2024
Tuesday, June 30, 2020
मन के हारे हार है मन के जीते जीत
संत कहते हैं, जब तक हम मन के द्वारा चलाये जाते हैं हम साधक नहीं हैं, जब हम मन को चलाते हैं तब साधक की श्रेणी में आते हैं. मन को चलाने का अर्थ है मन पर कार्य करना. जब हम देह द्वारा कार्य करते हैं, हमारा कार्य व्यायाम नहीं कहा जा सकता, जब देह पर कार्य करते हैं अर्थात भार उठाना, दौड़ना, आसन आदि, उसे ही व्यायाम कहते हैं. देह की शक्ति उसे हिलाने-डुलाने से बढ़ती है पर मन की शक्ति उसे स्थिर और एकाग्र रखने से बढ़ती है. धारणा, ध्यान, चिंतन, मनन, समाधि यह सब मन पर कार्य करने की विधियां हैं. प्रकृति के साथ कुछ समय बिताने से भी मन सहज ही शांति का अनुभव करता है. मंत्र जाप अथवा ध्यान की कुछ मुद्राओं में बैठने मात्र से भी मन एकाग्र होता है. कोई नदी जब शांत हो तो उसकी तलहटी भी दिखाई देती है और जब पानी का बहाव तेज हो तो पानी के अतिरिक्त कुछ भी स्पष्ट नहीं होता. मन भी एक धारा की तरह है, यदि उसका बहाव धीमा होगा तो आत्मा का प्रतिबिम्ब उसमें झलकेगा, जब हम विचारों से घिर जाते हैं तब स्वयं से दूर चले जाते हैं, यही तनाव का कारण बनता है.
Tuesday, January 21, 2020
जीवन का जो लक्ष्य साध ले
सन्त और शास्त्र हमें समझाते हैं कि मन को विकारों से मुक्त करें, परमात्मा का नाम भजें और जिस काम के लिए मानव जन्म मिला है उसे करने में अपना समय लगाएं. सुबह से शाम तक हमारा समय नौकरी करने, भोजन करने, विश्राम करने में ही निकल जाता है. जो समय हाथ में रहता है वह टीवी, अख़बार, मोबाईल आदि में चला जाता है. कभी घूमने में तो कभी सिनेमा आदि देखने में या रिश्तेदारों और मित्रों से मिलने में चला जाता है. इन सब कार्यों में कितनी बार अनचाहा होता है तो मन उदास होता है, क्रोध से भर जाता है, कभी झुंझलाहट से और कभी द्वेष से. मन जब पूरी तरह प्रसन्न होता है ऐसे क्षण भी आते हैं पर वे टिकते नहीं. इसी तरह जीवन गुजरता जाता है और एक दिन जीवन की साँझ आ जाती है. परमात्मा से जिसने नाता जोड़ा ही नहीं उसे उसके नाम स्मरण में कैसे आनन्द आएगा, जिसने कभी मन को समझा ही नहीं, वह मन के पार जाकर शांति का अनुभव कैसे कर पायेगा, इसीलिए वृद्धावस्था आते ही रोग पकड़ लेते हैं. अधिकांश रोगों का संबंध मन से होता है, मन यदि सहज रूप से प्रसन्न रहना नहीं जानता, वह तनावपूर्ण स्थिति में रहता है, तनाव से ही देह में जहरीले रसायनों का जन्म होता है और शरीर भी अस्वस्थ हो जाता है. बचपन से ही यदि हम बच्चों और युवाओं को ध्यान, स्मरण आदि से जुड़ना सिखाएं तो उनका जीवन अंतिम श्वास तक खुशियों से भर रह सकता है.
Wednesday, January 30, 2019
उसके कदमों में झुकना है
३१ जनवरी २०१९
जीवन में कोई आदर्श न
हो, कोई ऐसा न हो जिसके सामने सिर झुकाया जा सके तो जीवन का मर्म कभी नहीं खुल
सकता. जिसके भीतर प्रेम और आदर को स्थान नहीं मिला उसके मन में भक्ति और श्रद्धा
कैसे खिल सकती है. हमें अपने बड़ों का आदर करना है ताकि हमारा उद्धार हो, छात्रों
को शिक्षकों का सम्मान करना है तभी वे उनके दिए ज्ञान को ग्रहण कर सकेंगे. पुत्र
को पिता के पैर छूने हैं ताकि एक दिन उसका सिर भीतर परमात्मा के सम्मुख भी झुक
सके. बहू को सासूजी का कहा मानना है ताकि एक दिन उसके भीतर देवी का जागरण हो सके. आधुनिकता
के नाम पर आज हम सारी सम्भावनाओं को ही खत्म दिए जा रहे हैं. छोटे-छोटे बच्चे
माँ-पिता के सामने जवाब देने लगे हैं, जो मन माता-पिता के सम्मुख नहीं झुकता वह कभी
परमात्मा के सामने झुकेगा इसकी कल्पना व्यर्थ है. ऐसा मन यदि भविष्य में तनाव का
शिकार होता है तो कोई आश्चर्य नहीं. झुकना हमारे लिए सार्थक है, जिसके सम्मुख हम
झुकते हैं उसके लिए नहीं.
Thursday, August 23, 2018
सुख-दुःख मन की ही कलियाँ हैं
२३ अगस्त २०१८
कितनी बार हमने ये
शब्द नहीं सुने हैं, ‘हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं’. भाग्य का अर्थ जीवन
में केवल सुखद परिस्थितियाँ आना ही तो नहीं है. जो भी हमारे साथ घट रहा है, वह सब हमारे
ही द्वारा रचा गया है. सुख को तो हम स्वयं की कृति मान सकते हैं, पर दुःख का कारण स्वयं को नहीं मानते. यही बात है कि दुःख जीवन से
कभी विदा ही नहीं लेता. अनजाने में हम स्वयं ही रोज-रोज इसकी नई-नई फसल बोते रहते
हैं और हर बार इसका कारण किसी न किसी पर डाल देते हैं. जीवन में किसी ने कामयाबी
हासिल की तो हम उसकी मेहनत और कठोर परिश्रम के कारण उसे बधाई देते हैं, इसी तरह जब
कोई अपने जीवन में असफल हुआ, अस्वस्थ हुआ और दुखी हुआ, यदि उसी क्षण वह इसकी
जिम्मेदारी भाग्य पर न डालकर स्वयं पर लेने की हिम्मत दिखाए, उसी क्षण से उसका
भाग्य बदलने लगता है. हमारे मन का तनाव भी खुद का बनाया हुआ है और हमारे मन का
उल्लास भी हमारी ही रचना है. जीवन हर क्षण एक सा है, हमारी दृष्टि जैसी होगी वह
वैसा ही दिखाई देने वाला है. किसी के पास कुछ भी न हो पर उसका मन प्रसन्न रहने की
कला जानता हो तो वह अभाव का अनुभव ही नहीं करेगा. किसी के पास सब कुछ हो और मन को
खिलने की कला नहीं आती हो तो वह उस सुख को भी पीड़ा में बदल सकता है.
Thursday, June 7, 2018
मुक्त सदा जो मन तनाव से
८ जून २०१८
आज के युग में तनाव या डिप्रेशन का होना एक सामान्य सी घटना
हो गयी है. व्यक्ति चाहे किसी भी उम्र का हो, किसी भी वर्ग, धर्म, जाति या लिंग का
हो, तनाव से ग्रस्त होना जैसे उसका मौलिक अधिकार बन गया है. आये दिन समाचार पत्रों
में इसके बार में हम पढ़ते ही रहते हैं. क्या इसका कोई समाधान है, संत कहते हैं,
जीवन आनंद से भरा है, शांति और प्रेम के धागों से बुना है, सुख और ज्ञान इसके फल
हैं. ऐसा जीवन पाने की एक ही शर्त है पवित्रता और आत्मशक्ति ! यदि जीवन में
अनुशासन हो, ध्यान और साधना के द्वारा आत्मशक्ति का संवर्धन हो तो तनाव उसी तरह
दूर रहता है जैसे प्रकाश के सम्मुख अँधेरा. कृष्ण कहते हैं, योग के मार्ग पर किया
गया अल्पप्रयास भी महान फल देने वाला होता है. स्वाध्याय, सत्संग, सेवा और साधना के
चार पहियों पर जीवन की गाड़ी सहज ही नई मंजिलों की ओर ले जाती है. यह एक ऐसा मार्ग
है जिसमें हर कदम पर पूर्णता भी है और आगे बढ़ते रहने की ललक भी. जहाँ प्रियतम के
साथ संयोग और वियोग एक साथ घटते हैं.
Wednesday, June 6, 2018
कबिरा मन निर्मल भया
६ जून २०१८
संत कहते हैं, हमारे मन का आकाश यदि विचार रूपी बादलों से ढका न हो तो अपने निर्मल
स्वभाव को सहज ही प्राप्त हो सकता है. जब भीतर कोई भय न हो, तनाव या संशय न हो और
न ही कोई इच्छा हो, कुछ त्यागने या ग्रहण करने की प्रवृति भी न हो, तभी मानना होगा
कि मन खाली है. इस खालीपन को चैतन्य से भरने की आकांक्षा भी न हो, तब जो अनुभूति
होगी उसे अनुभव करने वाला भी वहाँ कोई नहीं होगा, मात्र अनुभव ही जब शेष रह जाता
है तब जीवन का मर्म समझ में आता है.
Wednesday, July 20, 2016
मन हुआ जब सहज संतोषी
२१ जुलाई २०१६
हमें अपनी प्राथमिकताओं को समझना होगा. जीवन में हम क्या
चाहते हैं, क्या सुख-सुविधा जुटाना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है. स्वयं को स्वस्थ व
सुरक्षित बनाये रखने में ही क्या हमारी सारी ऊर्जा व्यय होती है. इन सबको प्राप्त
करते हुए क्या भीतर तनाव भी होता है. यदि हाँ, तो हम जो चाहते हैं हमारे कर्म उसके
विपरीत हैं, वे हमें अपने लक्ष्य से दूर ही ले जायेंगे. जीवन स्वयं में आनन्द है,
जीवन मात्र ही अनंत सुख का स्रोत है, क्या इसका अनुभव होने पर कोई अभाव रहेगा.
संतोष तब सहज स्वभाव बन जायेगा और स्वास्थ्य तब प्राप्त करना नहीं होगा, हम स्व
में ही स्थित रहेंगे.
Tuesday, December 25, 2012
मानव होना सीखें हम
दिसंबर २००३
मानव एक पुल है, जिसके एक ओर
पशुता है और दूसरी ओर देवत्व, चुनाव उसके हाथ में है, क्रोध, हिंसा उसे पशु के
समान बनाते हैं, प्रेम, उदारता देवों के समान. ऊर्जा भीतर एक ही है, दिशा भिन्न
है, हर पल उसे दोनों में से चुनाव करने का अवसर मिलता है, यही तनाव उसे व्यथित
किये रहता है, पशुता में उसका आकर्षण है क्योंकि वहाँ कोई जिम्मेदारी नहीं, देवत्व
उसे चाहिए पर कीमत चुकाए बगैर, इसी कशमकश में मानव कहीं भी नहीं पहुंच पाता. नशा करके
वह इस चुनाव से मुख मोड़ लेता है, यह नशा मादक द्रव्य का भी हो सकता है, धन, पद या
यश का भी. वह अपनी एक मनमोहक छवि बना लेता है, और स्वयं ही धोखे में आ जाता है. इस
पुल से निजात पाने का एक उपाय है, एक नई दिशा की तलाश, केवल मानव होने की
आकांक्षा, जहां है वहीं रहकर स्वयं में टिक जाने का प्रयास, अपने भीतर जाने का
प्रयत्न, तब चुनाव से परे होकर जीना होगा, जब जो मिले उसे सहज ही स्वीकारना, अमृत
हो या विष दोनों को समता की भावना से ग्रहण करना. न कुछ पाने की चाह हो न कुछ
त्यागने की, ऐसा मन ही परमात्मा की निकटता को अनुभव कर सकता है.
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