Saturday, January 11, 2014

पाना है उस एक को

जून २००५ 
हमारे अंतर्मन की गहराइयों में कितना कुछ छिपा है, एक संस्कार जगते ही उसके पीछे विचारों की एक श्रृंखला जग जाती है. ऊपर-ऊपर से हम कहते हैं कि हम देह नहीं है आत्मा हैं, पर भीतर जाकर पता चलता है, हमारा चिपकाव देह, मन, बुद्धि से कितना गहरा है. प्रतिक्रिया का अर्थ है हम मुक्त नहीं हुए, भीतर उस वक्त भी बोध रहे कि हम कैसी प्रतिक्रिया जगा रहे हैं, क्रोध करते समय यह भान रहे कि यह क्रोध है तो धीरे-धीरे हम उससे मुक्त हो जाते हैं. हमें सूक्ष्मता से अपना निरीक्षण करना होगा, तभी आत्मा का सूर्य हमारे भीतर जगमगा उठेगा, कितनी परतें है हमारे जीवन की, देह, प्राण, मन, बुद्धि, स्मृति, अहंकार. प्रकृति के इन रूपों में कब तक उलझते रहेंगे, वह नित्य नवीन है पर परिवर्तनशील है, आत्मा अबदल है, सदा एक सा है, वह ज्ञान, प्रेम तथा आनन्द का अनंत भंडार है, उसको ही हमें जानना है जिसे जानकर कबीर, मीरा, सुर, तुलसी, नानक, बुद्ध मुक्त हो गये, सद्गुरु भी हमें वहीं से पुकार रहे हैं.

Wednesday, January 8, 2014

वंशीधर घट घट का वासी

जून २००५ 
धैर्य खोकर हम हमारे छोटे से दुःख को भी बड़ा बना लेते हैं और धैर्य रखकर बड़े दुःख को तिलमात्र का ! हम लोगों के बारे में एकतरफा राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार उनसे व्यवहार करते हैं, यही माया है, चीजें जैसी हैं वैसी ही दिखने लगें तभी समझना चाहिए कि माया से मुक्त हुए. हम स्वयं को कुछ ज्यादा ही महत्व देते हैं, यह दुनिया हमारे बिना भी बेहतर ढंग से चल रही थी और हमारे न होने पर भी चलती रहेगी. जब तक हमें अपना पता नहीं है तब तक जो कुछ भी हमारे साथ होता है वह हमारे लिए उस परमपिता परमेश्वर ने ही ही रच है, इस भावना से यदि हम भावित रहें तो कोई द्वंद्व नहीं होगा. मृत्यु से पहले हमें खुद को जानना है यह लक्ष्य याद रहे तो समय का सदुपयोग होगा. हमारा जीवन प्रभु की अनमोल देन  है उसी की धरोहर है यह भाव दृढ होते ही वह हमारे, प्राणों में अपनी बांसुरी के स्वर भर देता है. नयनों में अपना प्रकाश. उससे मिले कई युग बीत गये हों पर वह कभी दूर गया ही नहीं. 

Tuesday, January 7, 2014

तू ही सागर है तू ही किनारा


भगवद कथा हमें अपने स्वरूप में स्थित करने के लिए उपचार है. हमने जो अपने आप को बंधन में पड़ा हुआ मान लिया है, उससे छुड़ाने के लिए औषधि है. हरि ने अपने को अति सुलभ बना कर छिपा लिया है, उस हरि का परिचय कराने कथा आती है. हम जब पाठ करते हैं तो कई अर्थ छिपे रह जाते हैं, किसी सन्त द्वारा कही गयी कथा का श्रवण करने से भीतर जागृति होती है, अहं पिघल कर बह जाता है, सभी कुछ भीग जाता है, हृदय द्रवित हो जाता है. वह हरि प्रेमस्वरूप है, उसके प्रेम की आंच हमारे अंतर को गला देती है, किन्तु भीतर एक शीतलता का अहसास होता है. यदि ऐसा न हो तो हमारा सुनना व्यर्थ ही है. उसे हमारी हालत का पता है, वह हमारे मन की दशा से परिचित है, वह स्वयं तो मन, बुद्धि से परे है पर उससे कुछ छिपा नहीं है. वह अकर्ता भी है और कर्ता भी, वह सब कुछ है और कुछ भी नहीं. वह बुद्धि की समझ में आने वाला नहीं है, वह अद्भुत है लेकिन प्रेम की भाषा वह पढ़ लेता है. हम जिस क्षण उसके साथ होते हैं प्रेम का अनुभव करते हैं अथवा जिस क्षण प्रेम में होते हैं हम उसी के साथ होते हैं. वह ही एक मात्र जानने योग्य है, उसी को अनुभव करना है. सारी साधना का हेतु वही है, वह आनंद है, रस है, ज्ञान है, शांति है, प्रेम है और शक्ति भी वही है. इस सारे विश्व को उसने एक शक्ति से जोड़ा है, वही वह है. 

Monday, January 6, 2014

एक वही पाने योग्य है

जून २००५ 
शास्त्रों में लिखा है सूर्य नाड़ी चलती हो तब भोजन करें तो शीघ्र पचता है और पेय पदार्थ तब लें जब चन्द्र नाड़ी चलती हो. जगत का सार शरीर है, शरीर का सार इन्द्रियां हैं, इन्द्रियों का सार मन है, मन का सार प्राण है, प्राण का सार आत्मा है. सन्त जन सचेत करते हैं और व्यर्थ के कार्य-कलापों में अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने से रोकते हैं, जो उस आत्मा की प्राप्ति में सहायक हो उसे ही करना है, अन्यथा जो सहज कर्त्तव्य रूप में सामने आता जाये. जब तक संसार से सुख पाने की वांछा बनी रहेगी, तब तक पूर्ण सत्य का पता नहीं चलेगा. कृष्ण ने कहा है जिस भाव से कोई मुझे भजता है मै उसी भाव से उससे मिलता हूँ. यदि समपर्ण पूर्ण नहीं है तो अनुभव भी पूर्ण नहीं होगा. 

Sunday, January 5, 2014

तेरा तुझको अर्पण

जून २००५ 
ईश्वर प्राप्ति के लिए हमारे मन में जब दृढ़ता नहीं रहती, तभी नियम में हम स्थिर नहीं हो पाते. मन में तड़प हो, छटपटाहट हो तभी उसका स्मरण सदा रहेगा. मोह-ममता मिटाने के लिए ईश्वर हमारे जीवन में कई परिस्थितयों का निर्माण करते हैं. हमें अपने मन की समता बनाये रखनी है, हर सुख-दुःख को समर्पित करना है. तीनों तापों से बचने का यही उपाय है. जो अपने भीतर संतुष्ट रहता है, उसकी समस्त कामनाओं का स्वतः ही परिमार्जन हो जाता है अर्थात अनावश्यक जीवन से झर जाता है. वह इस जीवन में फिर सहज हुआ प्रारब्ध के अनुसार अपना समय बिताता है. उसकी दौड़ समाप्त हो जाती है, कुछ करने व पाने की आशा उसे अब नचाती नहीं. वह जीते जी मुक्त हो जाता है. उसका न कोई शत्रु है न कोई मित्र, सारे द्वन्द्वों से पार हुआ वह अपने आप में अर्थात आत्मा में ही तुष्ट रहता है. जगत उसके लिए स्वप्न वत् अथवा क्रीडांगन हो जाता है. वह जीवभाव से मुक्त होकर आत्मभाव में निमग्न रहता है. 

Thursday, January 2, 2014

जुड़ जाएँ हम अपने से ही

जून २००५ 
सन्त कहते हैं, जाने-अनजाने सभी प्राणी ईश्वर की ओर जा रहे हैं, वही हमारा ध्येय है, वही हमारा प्राप्य है, मित्र है, आत्मीय है, अपना है, सदा साथ है. संसार साथ रहते हुए भी कभी साथ नहीं रहता, अन्यथा किसी को अकेलेपन का अनुभव नहीं हो सकता था. संसार में सभी कुछ बदल रहा है, पर भीतर एक केंद्र है जहां कुछ भी नहीं बदलता अन्यथा हम इस परिवर्तन का आभास ही नहीं हो सकता था. जो उस केंद्र से परिचित है जुड़ा है, वह स्थितप्रज्ञ है जो वियुक्त है वह हवा में उड़ने वाले पत्ते की तरह इधर-उधर भटकता है. हमारे केंद्र में जिसे आत्मा भी कह सकते हैं, असीम प्रेम है, सभी के भीतर उस की सत्ता है, जो परमात्मा का अंश है. उसका भान न होने पर व्यक्ति स्वयं को विशिष्ट मानता है जो दुःख का कारण है. ध्यान के द्वारा हम अपने केंद्र से जुड़ सकते हैं, तब व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति हमें अपना गुलाम नहीं बना सकती, पूर्ण स्वाधीनता का अनुभव तभी होता है. स्वराज्य घटित होता है. तभी अध्यात्म में प्रवेश मिलता है. जीवन तब सहज हो उठता है, कोई कार्य तब सप्रयास नहीं होता, छोटा हो या बड़ा सभी कार्य अपने-आप होते प्रतीत होते हैं, हम साक्षी भाव में आ जाते हैं. 

Wednesday, January 1, 2014

शुभता का ही वरण करें हम

जून २००५ 
हमारे भीतर का ज्ञान, व्यवहार तथा वाणी से ही प्रकट होता है, हम यदि झुंझला जाते हैं, खिन्न हो जाते हैं अथना टेढ़ा बोलते हैं तो हम हिंसा कर रहे होते हैं, जिसका पहला शिकार हम स्वयं होते हैं. वाणी के साथ-साथ हमारे हाव-भाव तथा व्यवहार की सूक्ष्म तरंगें भी सामने वाले व्यक्ति को छूती है. हमारे भीतर क्रोध, भय आदि के संस्कार हैं, परिस्थिति आने पर यदि हम भय अथवा क्रोध के शिकार नहीं होते उससे बच निकलते हैं तो वह संस्कार नष्ट होने लगता है अन्यथा उर्वरक भूमि पाते ही जमने लगता है और वृक्ष रूप में बढ़ने लगता है, भविष्य में उसमें अनेकों फल लगने ही वाले हैं तथा अनेकों बीज बनने वाले हैं, जिससे दुःख ही दुःख मिलने वाले हैं. इसी तरह भीतर प्रेम व शांति के संस्कार भी छुपे हैं हैं. प्रेम की तरंगे शब्दों से पहले ही सम्मुख उपस्थित व्यक्ति के हृदय को छू लेती हैं, वे निशब्द होकर भी बहुत कुछ व्यक्त कर देती हैं. प्रेम का एक बीज भविष्य में वट वृक्ष बनने वाला है.