Saturday, September 17, 2016

चलें मूल की ओर

१७ सितम्बर २०१६ 
जीवन के लिए जो भी अति आवश्यक है, प्रकृति ने उसे सहज ही दिया है. हवा, पानी, धूप के बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते. प्रातःकाल की शुद्ध वायु में भ्रमण, जब सूर्य की किरणें भी धरा का स्पर्श करती हों तथा जब भी सम्भव हो सके सागर, नदी अथवा खुले जल स्रोत के निकट शीतल जल का सान्निध्य, तन और मन को प्रफ्फुलित कर देता है. प्राणायाम के रूप में वायु एक औषधि भी है, जल और धूप भी प्राकृतिक चिकित्सा में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. आज शहरी सभ्यता के दुष्प्रभाव अनेक बीमारियों के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं, जिनका समाधान प्रकृति के द्वारा   किया जा सकता है.    

Wednesday, September 14, 2016

सत्यं शिवं सुंदरं

१५ सितम्बर २०१६ 
जीवन हजार रूपों में हमारे सम्मुख आता है और हर रूप एक से बढ़कर एक होता है. अभी धूप खिली थी और न जाने कहाँ से बादलों का हुजूम चला आता है, बरसने लगता है. प्रकृति भरपूर है, वह अपनी नेमतें हर पल लुटा रही है. जीवन का आधार इस सौन्दर्य के पीछे छिपा है. वही हर कृत्य को अर्थ से भर देता है, मनसा, वाचा, कर्मणा हमारा हर छोटा-बड़ा कृत्य उसी से उपजा है और उसी के लिए है जब यह सत्य उद्घाटित होता है तब मानो हर तरफ जीवन खिलता हुआ प्रतीत होता है. 

कुदरत के संग जीना है

१४ सितम्बर २०१६  
सद्गुरू कहते हैं एक ही तत्व से यह सारा अस्तित्त्व बना है ! सारा खेल ऊर्जा का ही है ! मन भी ऊर्जा है और तन भी ! सब चेतना ही है, जो ऊर्जा बहती रहे वही सफल है. भोजन, जल, सूर्य, नींद तथा श्वास सभी तो ऊर्जा के स्रोत हैं, हम जिनसे लेते ही लेते हैं, लेकिन जब तक देना शुरू नहीं कर देते तब तक ऊर्जा भीतर दोष पैदा करना शुरू कर देती है. रचनात्मकता तभी तो हमें स्वस्थ बनाये रखती है. यदि हम एक माध्यम बन जाएँ जिसमें से प्रकृति प्रवाहित हो और अपना काम करती जाये, हम उसके मार्ग में कोई बाधा खड़ी न करें, तो हम जीवन के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं.

Tuesday, September 13, 2016

द्वैत मिटेगा जब भीतर से

१३.९.२०१६ 
शिशु अबोध होता है, उसे अपने पराये का बोध नहीं होता, वह सभी को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है. वयस्क होने पर उसे भेद का बोध होता है, वह जगत को बाँट कर देखता है. राग-द्वेष जगाता है. उसका निर्दोष स्वभाव खो जाता है. उसे यदि पुनः अपने सहज स्वरूप को पाना है तो प्रतिक्रमण करना होगा. पुनः द्वैत की दुनिया के पार जाना होगा. उस ‘एक’ में गये बिना मुक्ति नहीं. साधना होगा मन को ताकि भीतर उस 'अबोधता' को पा सके जो एक शिशु के रूप में उसे सहज ही प्राप्त थी. 

Thursday, August 18, 2016

यह राखी बंधन है ऐसा

१८ अगस्त २०१६ 
रक्षा का यह बंधन जो बांधता है और जो बंधवाता है दोनों के लिए एक सा महत्व रखता है. एक मर्यादा का प्रतीक है यह रेशमी धागा, मर्यादा मूल्यों की, प्रकृति के संरक्षण की और स्वयं को उच्च जीवन की और ले जाने वाले पथ पर स्थिर रहने की. कलाई में बंधा यह याद दिलाता है कि संबंधों की गरिमा को हर हाल में निभाना है, निभाना ही नहीं उनमें नित नये रंग भरने हैं. सीमाओं में बंधी सुंदर जलधार ही नदी कहलाती है, जिसके दोनों तटों पर जीवन खिलता है. उसी तरह जीवन को कुछ मर्यादाओं में बांधकर गति प्रदान करने का उत्सव है रक्षा बंधन, जिसके कारण समाज में एकत्व और आत्मीयता की भावना का विकास होता है.     

Thursday, August 11, 2016

माली सींचे मूल को

१२ अगस्त २०१६ 
जब तक स्वयं की सही पहचान नहीं मिलती, जीवन में एक अधूरापन महसूस होता है. सब कुछ होते हुए भी एक तलाश जारी रहती है. देह किसी भी क्षण रोगग्रस्त हो सकती है, मृत्यु को प्राप्त हो सकती है, यह भय भी अनजाने सताता रहता है, शेष सारे भय उसकी की छाया मात्र हैं. स्वयं की पहचान करना इतना महत्वपूर्ण होते हुए भी हम इस कार्य को टालते रहते हैं, इसका कारण शायद यही है कि हमें लगता ही नहीं कि हम स्वयं को नहीं जानते, तभी हम अक्सर दूसरों से यह कहते हैं, तुम मुझे नहीं जानते. इस जानने में एक बड़ी भूल यह हो रही है कि जन्म के बाद इस जगत में हमने जो भी हासिल किया है, उसी से हम स्वयं को आंकते हैं. वृक्ष का जो भाग बाहर दिखाई देता है उसका मूल भीतर छिपा है. इस जीवन में हमने जो भी पाया अथवा खोया है उसका मूल भीतर है. यदि बाहर को संवारना है तो मूल से परिचय करना ही होगा.  

Tuesday, August 9, 2016

जीवन इक वरदान बने

९ अगस्त २०१६ 
यदि कोई तारों भरे आकाश को देखकर प्रफ्फुलता से नाच सकता है, और सुबह की किरण का स्पर्श पाकर उसी भांति उठता है जैसे पंछी जगते हैं तो वह अभी भी निसर्ग से जुदा नहीं हुआ है. शहर की प्रदूषित हवा और कंक्रीट के जंगलों में पला व्यक्ति आज कुम्हला गया है क्योंकि न तो वहाँ पूर्णिमा का चाँद दिखाई देता है न भोर का उगता हुआ सूरज..जंगल और गाँव के निकट रहने वाला व्यक्ति अभी भी खिला नजर आता है. प्रकृति कुछ करती नजर नहीं आती पर वहाँ सब कुछ अपने आप होता है. प्रकृति से जुड़ा व्यक्ति भी कुछ करता हुआ नहीं लगता, उससे कर्म होते हैं वैसे ही जैसे पेड़ों पर फूल लगते हैं. तब जीवन अपने आप में पूर्ण नजर आता है.