Monday, October 10, 2011

ध्यान और मुक्ति


मई २००२ 
धरती के अंधकार, मौन और चुप्पी में ही बीज प्रस्फुटित होता है. ध्यान भी ऐसे ही घटता है, मौन मन का होना चाहिए, मन यदि व्यर्थ का प्रलाप करता रहे तो ध्यान नहीं होगा. और एक बार यदि ध्यान का अनुभव हो गया तो भीतर सुप्त प्रेम जागृत हो जाता है, वह ज्ञान जो अभी स्पष्ट नहीं है दिखाई देगा और ऐसा प्रेम हमें आनंद के उस अक्षय स्रोत से मिलाएगा जो सरस है, अनंत है. जीवन में ही मुक्ति का अनुभव साधक कर सकेगा.

Saturday, October 8, 2011

ज्ञान के मोती


मई २००२ 
हमारा मन ही हमें सुख-दुःख प्रदान करता है, कोई बाहरी व्यक्ति या परिस्थिति हमें हमारी इच्छा के बिना विषाद नहीं दे सकती. आंतरिक शत्रुओं को नष्ट करते ही सभी हमारे मित्र हो जाते हैं. जैसे-जैसे हम ज्ञान के सागर में गहरे उतरते जाते हैं, मोती और सुंदर होते जाते हैं. सदगुरु ज्ञान का सागर है जिसके वचन सुनहरे मोती हैं जिनकी चमक हमें धारण करनी है जिसके प्रकाश में हमारी आत्मा प्रकाशित होगी.  

Friday, October 7, 2011

वह पूर्ण है


ज्ञान वहीं टिकता है जहाँ वैराग्य है. मैं कुछ हूँ तो मेरा भी कुछ होगा, यदि मैं कुछ नहीं तो मेरा भी कुछ नहीं, फिर कैसा बंधन और कैसी मुक्ति? सदगुरु कामना शून्य है, अहंकार शून्य है जो स्वयं भी वैसा हो जाता है वही ईश्वर को पा सकता है. जैसे हवा है और धूप है वैसे ही ईश्वर हमारे चारों ओर मौजूद है पर कुछ होने का भाव ही उससे दूरी बना देता है. उसे एकछत्र अधिकार चाहिए. मन यदि पूरा उसे नहीं सौंपा तो वह कुबूल नहीं करता. गुरु नानक ने कहा है पूरा प्रभु आराधिए, पूरा जाका नाम, पूरा पूरे से मिले, पूरे के गुन गाम !  

Wednesday, October 5, 2011

जागृत मन


मई २००२ 
मन सोया है या जाग गया है इसका पता कैसे चले तो शास्त्र बताते हैं कि सजगतापूर्वक वर्तमान में रहना इसकी पहली निशानी है. भूत का पश्चाताप भीतर न चलता हो भविष्य की कल्पना में संकल्प न उठते हों जिस क्षण जो कार्य हम कर रहे हों पूर्ण रूप से मन वहीं टिका हो तो ऊर्जा बचती है. दूसरी पहचान है मन सहज ही आनन्दित हो कुछ करके या कुछ पाकर खुश होना सोये मन का काम है, समाहित मन तो भीतर अपने मूल से जुड़ा होने कारण सहज ही प्रसन्न होता है. अहंकार वर्तमान में नहीं होता अहंकार भूत या भविष्य के साथ ही जुड़ा है और दुख का कारण वही है. जो वस्तु, व्यक्ति, या परिस्थिति हमारे सामने आये सहज बुद्धि से उसके साथ व्यवहार करने के बाद यदि मन खाली रहता है तो मन जाग गया है. यदि प्रभाव में आ जाता है तो सोया है.   
  

Tuesday, October 4, 2011

दिव्यता


मई २००२

मन को नींद से जगाना है, शोध करते-करते ही बोध होता है. मन की गांठ जब तक नहीं खुलेगी तब तक अज्ञान नहीं मिटता और अज्ञान मिटे बिना ईश्वर का अनुभव भी नहीं होता. राग, द्वेष, अहंता, ममता आदि जीव की सृष्टि में हैं ईश्वर की सृष्टि में नहीं. अपनी प्रकृति तथा स्वभाव के अनुसार हम प्रेरित हो रहे हैं और सुख-दुःख का अनुभव कर रहे हैं. अपने तुच्छ स्वभाव को दिव्य स्वभाव में बदलना ही साधना है, और यही जागरण है, जिसके बाद ही हम मानव होने की गरिमा को प्राप्त होते हैं. 

Monday, October 3, 2011

आनंद

मई २००२ 
जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता है एक निर्दोष आनंद, एक ऐसी मुस्कान जो कोई हमसे छीन न सके. किसी को मुझसे भय न हो और किसी से मुझको भय न हो यह बहुत बड़ा गुण है. जितना-जितना हम स्वयं को व्यर्थ के संकल्पों से खाली करते जायेंगे वह आनंद जो भीतर ही है, कहीं से लाना नहीं है, भरता जायेगा, वह मुस्कान भी हमारी आत्मा प्रतिपल लुटाए जा रही है पर मन का आवरण उसे प्रकट होने नहीं देता. मन में श्रद्धा हो तो धीरे धीरे वह समाहित होने लगता है और आवरण क्षीण होने लगते हैं.

Saturday, October 1, 2011

मृण्मय और चिन्मय


अप्रैल २००२ 
हमारे विचारों का केन्द्र चिन्मय है अथवा मृण्मय, इस पर ही सब निर्भर करता है. हमारा मन, बुद्धि देह सभी मृण्मय हैं पर इनका प्रयोग हमें चिन्मय को जानने के लिए करना है. ऐसा कब होगा, कैसे होगा यह तो समय ही जानता है पर हमारी जीवन यात्रा यदि उस ओर हो तो आनंद हमारा सहचर बन जाता है. जैसे जल में प्रवेश करते ही उसकी शीतलता का अनुभव होता है, चिन्मय जो सत् चित् आनंद स्वरूप है उसका चिंतन करते ही उसकी हवा हमें छूने लगती है. पहले उसे स्थूल रूप में देखना है फिर सूक्ष्म भी अनुभव में आयेगा. प्रकृति में उसी का रूप छिपा है. जैसे मोती धागे में पिरोये होते हैं सारा जगत उसी में पिरोया हुआ है.