चुनावों की तिथियाँ घोषित हो चुकी हैं और आचार संहिता भी लागू हो
गयी है. उम्मीद की जा सकती है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में हिंसा रहित और
निष्पक्ष चुनाव होंगे. एक उत्सव की तरह सारा देश इसमें पूरे मन से भाग लेगा और आने
वाले दिनों में समाचार पत्रों व टीवी पर विरोधी पक्ष एक दूसरे के प्रति अभद्र भाषा
का प्रयोग नहीं करेंगे. एक सामान्य भारतीय नागरिक होने के नाते इतनी उम्मीद तो रखी
जा सकती है कि कोई भी दल आचार संहिता का उल्लंघन नहीं करेगा और देश का वातावरण
सौहार्दपूर्ण बना रहेगा. देश के भीतर तथा आदेश के बाहर कुछ ऐसे तत्व हैं जो आपसी विवादों
का गलत उपयोग करते हैं, उन्हें इसका अवसर न मिले ऐसा प्रयास हर नागरिक व पार्टी को
करना ही चाहिए. कृपया आने वाले चुनावों में अपना मत देकर लोकतंत्र के इस उत्सव में
आप सभी सम्मिलित हों.
Sunday, March 10, 2019
Friday, March 8, 2019
खिलकर ही जीवन मिलता है
सत्य समग्रता में मिलता है विश्लेषण में खो जाता है. हम एक फूल
को देखते हैं और उसकी सुन्दरता से मुग्ध हो जाते हैं, उस बीज का हमें स्मरण ही
नहीं आता जिसने इस फूल तक की यात्रा में क्या-क्या सहा है. बीज से फूल बनने को जो
एक क्षण में देख लेता है वही परमात्मा के जगत होने को भी स्वीकार कर सकता है. फूल
कोमल है, सुंदर है, सुगंध से भरा है, अपनी और खींचता है, लुभाता है, बीज में ऐसा
कुछ भी नहीं, कोई विशेषता नहीं कि हम उसे अपने घरों, मंदिरों या केशों में सजाएं. हाँ,
बीज के भीतर अंकुरित होने की शक्ति है जो समुचित आधार पाकर विकसित हो सकती है. ऐसे
ही जगत रंगीन है, अपने रूप, रंग, गंध, स्वाद और स्पर्श से आकर्षित करता है, परमात्मा
निर्विशेष है, उसे आप किसी को दिखा नहीं सकते, वह अदृश्य है. उससे ही सब कुछ हुआ
है. उसके साथ यदि कोई जुड़ जाता है तो सहज ही वह भी विकसित होने लगता है, उसका अहम
गल जाता है और आत्मा का जो बीज भीतर सुप्तावस्था में था, प्रस्फुटित होने लगता है.
Thursday, March 7, 2019
महिला दिवस पर शुभकामनायें
नारी तुम केवल श्रद्धा हो..अथवा अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी..आजतक
स्त्री को या तो देवी कहकर पूजा जाता रहा है अथवा उसको कमजोर समझ कर दया की जाती
रही है. मध्यकाल में तो नायिका बनाकर उसके नख-शिख का वर्णन करके उसे भोग की वस्तु ही
बना दिया गया. किन्तु अब समय बदल रहा है, स्त्री ने स्वयं को पहचान कर अपनी
परिभाषा स्वयं लिखनी आरम्भ कर दी है. वह एक मानवी की भांति जीवन के हर रंग, उत्सव
और रस का अनुभव स्वयं करना चाहती है. वह सागर की गहराइयों को भी नाप सकती है और
अन्तरिक्ष की ऊंचाइयों को भी. आज कोई भी कर्मक्षेत्र ऐसा नहीं रह गया है जहाँ
महिला के कदम न पड़े हों. उसकी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक क्षमता पर अब
किसी को कोई संदेह नहीं रह गया है. महिला दिवस उसकी उपलब्धियों पर गर्व करने का क्षण
है और साथ ही उन लाखों महिलाओं की आवाज में आवाज मिलाने का वक्त भी जिन्हें अभी
इंसाफ नहीं मिला है, जो आज भी किसी न किसी कारण वश अपनी प्रतिभा को विकसित नहीं कर
पा रही हैं.
Tuesday, March 5, 2019
राग-द्वेष से मुक्त हुआ जो
अविद्या अथवा मोह हमें यथार्थ ज्ञान से वंचित रखता है. सुख
का प्रलोभन हमें रागी बनाता है और दुःख का भय द्वेषी. यदि हमारे कर्म राग, द्वेष
अथवा मोह से परिचालित होंगे तो कर्मों के बंधन से हमें कोई बचा नहीं सकता. इसके
विपरीत यदि हम सहज भाव से अपने नियत तथा कर्त्तव्य कर्म आदि करते हैं तो उसका कोई कर्माशय
नहीं बनता, जिसका फल हमें बाद में भोगना पड़े. राग और द्वेष ही वे दो असुर हैं
जिनके साथ एक साधक को अपने भीतर युद्ध लड़ना होता है. यदि कोई भी प्रवृत्ति राग
प्रेरित होगी तो उसका संस्कार और गहरा हो जायेगा और बाद में उससे मुक्त होने के
लिए उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा. इसी प्रकार यदि दुःख से बचने के लिए हम उद्यम
से द्वेष करते हैं तो प्रमाद का संस्कार गहरा होता जाता है. कृष्ण कहते हैं, राग और द्वेष
मनुष्य के बहुत बड़े शत्रु है, जो प्रत्येक इंद्रिय के
प्रत्येक विषय में स्थित रहते हैं, इनसे से ही काम-क्रोध की
उत्पत्ति होती है, जो समस्त विकारों के मूल हैं। जिसके
मन में कामना है, वह कभी सच्चे
अर्थ में सुखी नहीं हो सकता। कामना की पूर्ति में एक बार सुख की लहर-सी आती है, पर कामना ऐसी
अग्नि है, जो प्रत्येक अनुकूलता
को आहूति बनाकर अपना महत्व बढ़ाती रहती है। जितनी कामना की पूर्ति होती है, उतनी यह अधिक बढ़ती
है। कामना अभाव की स्थिति का अनुभव कराती है। जहां अभाव है, वहीं प्रतिकूलता
है और प्रतिकूलता ही दुख है। कामना कभी पूर्ण होती ही नहीं, इसलिए मनुष्य कभी
दुख से मुक्त हो ही नहीं सकता। इसलिए साधक को इन काम-क्रोध के मूल राग-द्वेष का
त्याग करना है.
Monday, March 4, 2019
हीरा जनम अमोल था
५ मार्च २०१९
जीवन कितना छोटा है, यह बात उससे बेहतर कौन जान सकता है जिसके जीवन की शाम हो गयी
है और किसी भी पल घोर अंधकार घट सकता है. जीवन कितना बहुमूल्य है यह मृत्यु शैया
पर पड़े किसी व्यक्ति की आँखों में स्पष्ट झलकता है. हम अभी न तो इतने वृद्ध हुए
हैं और न ही इतने अस्वस्थ, इसलिए अपने जीवन के अनमोल क्षणों को यूँही व्यर्थ के
वादविवाद में उलझाये चले जा रहे हैं. हमारे शास्त्रों में सत्य की तुलना रत्नों और
हीरों से की गयी है, क्योंकि जगत की दृष्टि में वे अति कीमती हैं, किन्तु सत्य
शाश्वत होने के कारण उनसे भी कीमती है और उस सत्य का अनुभव किये बिना एक और जन्म
गंवा देना उन दुखों को पुनः निमन्त्रण देना है जिनका अनुभव इस जन्म में हम अनेक
बार कर चुके हैं. यदि कोई एक बार निश्चय करता है कि इस क्षण से आगे उसका हर पल अपने
भीतर के उस सत्य की खोज में सहायक होगा जिसकी आराधना ऋषि-मुनि करते आये हैं, तो
इसी क्षण से जीवन में एक अनोखी सी सुवास भरने लगती है. दिशाएं भी उसका भान कराने
में उत्सुक हैं और हवाएं भी, बादल और यह पावन भूमि भी. जगत जिस राह चलता आ रहा है
चलता रहेगा, पर एक साधक को तो इसी कोलाहल में उस अदृश्य की वीणा के स्वर सुनने
हैं.
Sunday, March 3, 2019
शम्भो महादेवा
४ मार्च २०१९
वर्ष के ग्याहरवें महीने फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के एक दिन पहले जब अंधकार
का पूर्ण साम्राज्य छाने ही वाला होता है, शिव की आराधना की जाती है. शिव कल्याणकारी
हैं, वह संहारशक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं. वह परम विरक्त हैं. उग्र होते हुए
भी सौम्य हैं. रात्रि का आगमन होते ही सूर्य अस्त हो जाता है, प्रकृति की सारी
गतिविधियाँ शांत हो जाती हैं, निद्रा में चेतना भी खो सी जाती है. इसलिए शिव का
अवतरण दिवस शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन शिव
रूपी ब्रह्मांडीय ऊर्जा को रात्रि जागरण काल में साधक द्वारा सहज ही ग्रहण किया जा
सकता है. इस उपासना के फलस्वरूप साधक के हृदय से काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों का
नाश होता है और परम शांति, सुख व प्रेम का प्रसार होता है.
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Friday, March 1, 2019
शिव अनंत है
२ मार्च २०१९
सभी धर्म यह मानते हैं कि परमात्मा एक है. उस तक पहुंचने के
मार्ग पृथक-पृथक हो सकते हैं. इसमें भी किसी को संदेह नहीं कि परमात्मा सर्वज्ञ
है, सर्व शक्तिमान है और सब जगह है. वह प्रेम और आनंद का सागर है. मानव के भीतर
अनंत की कल्पना का बीज जिस क्षण पड़ा, परमात्मा जैसे पूर्णतया स्पष्ट हो गया. हमारे
चारों और का संसार पदार्थ और ऊर्जा से बना है, बनने और मिटने वाला है, किन्तु
विज्ञान कहता है पदार्थ को न तो बनाया जा सकता है न ही नष्ट किया जा सकता है, केवल
उसका रूप बदला जा सकता है. इसी प्रकार ऊर्जा का भी केवल रूप बदला जा सकता है, उसे
सृजित या नष्ट नहीं किया जा सकता. पदार्थ और ऊर्जा दोनों के पीछे जो एक और तत्व है,
जो दोनों का मूल है, जो कभी नहीं बदलता, वही शिव तत्व है. ऐसा कभी नहीं था कि वह नहीं
था, ऐसा कभी नहीं होगा कि वह नहीं होगा, और ऐसा नहीं है कि वह अभी नहीं है. उस एक
में टिककर ही पूर्ण विश्राम का अनुभव संतजन करते हैं.
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