Wednesday, September 25, 2013

खाली हुआ जो वही भरा

मार्च २००५ 
निर्मलता शांति को प्रकट करती है. आकाश यदि घनमालाओं से आवृत हो तो इतना विशाल प्रतीत नहीं होता, शुभ्र गगन अनंत शांति को प्रकट करता है. उसी तरह चिदाकाश भी जब वृत्तियों से रहित होता है तो निर्मलता को प्रकट करता है. सहज प्रेम भी उसी से फूटता है. भक्त फूल की तरह, नदी व सूर्य की तरह देना चाहता है, वह अपना आप खाली कर देना चाहता है, क्योंकि वह उसमें अनंत को भरना चाहता है, एक तरफ वह खाली होता जाता है और दूसरी तरफ भरता जाता है. पूर्ण मदा पूर्ण मिदं, पूर्णात पूर्ण मुदच्यत...अपने जीवन में जीता है. सत्य को अपने जीवन में घटते देखता है. शास्त्रों में जो लिखा है, वह अनुभूत सत्य है, जब भक्त के जीवन में वह घटित होता है तो शास्त्र के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है. ईश्वर की यह सृष्टि कितनी अद्भुत है.

Tuesday, September 24, 2013

एक संपदा सबके भीतर

मार्च २००५ 
भ्रान्ति और सत्य का पता तब तक नहीं चलता  जब तक हम चेतना के प्रति सचेत नहीं होते. धर्म का आदि बिंदु अतीन्द्रिय चेतना है, जब तक पदार्थ से परे आत्मा की चेतना का ज्ञान नहीं होगा तब तक हम द्वंद्व के शिकार होते रहेंगे. हम छिलकों से ही संतुष्ट न हो जाएँ, मूल को भी पायें, तब जो परिवर्तन हमारे भीतर होगा वह अतुलनीय होगा. मुक्ति का आरम्भ यहीं से होता है. हम यदि सुख के लिए पदार्थ को ही साधन बनाते हैं तो दुखी होने के लिए तैयार रहना होगा. यदि अक्षय सुख का स्रोत जो हमारे भीतर है, उसका अनुभव करते हैं तो जीवन में परम भक्ति का आगमन होता है. परमात्मा की शक्ति व प्रेम का अनुभव हर क्षण हमें होने लगता है. 

Sunday, September 22, 2013

सागर की पुकार सुनें जब

हम शुद्धात्मा हैं, मन पराधीन है, उस पर हमारा नियन्त्रण नहीं है, मन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार छिपे हैं, कितने विचार उसमें उठते हैं, संकल्प-विकल्प की लहरें व बुदबुदे सभी उठते हैं पर वे सब सतह पर हैं, आत्मा सागर है, उसका स्वभाव है स्थिरता. सागर द्रष्टा है. ध्यान में हम सतही मन से नीचे गहरे सागर के साथ एक हो जाते हैं, तब मन को उसी तरह देखते हैं जैसी किसी और को देख रहे हों. धीरे-धीरे विचार भी खो जाते हैं और दृष्टा अपने आप में रह जाता है, अखंड मौन का अनुभव जब साधक को पहली बार होता है तो लगता है जैसे कोई निधि मिल गयी हो. ध्यान पूर्ण जागृति का नाम है, मन सापेक्ष सत्य है, आत्मा निरपेक्ष सत्य है. वहाँ से लौटकर हमें निरंतर यह अनुभूति रहती है कि जो कुछ जगत में है एक मात्र वही सत्य नहीं है, बहुत कुछ है जो दिखाई नहीं पड़ता वह भी है. तब हम जगत में उलझते नहीं, मोह के शिकार नहीं होते. ऐसे आनन्द की अनुभति करते हैं जो बाहरी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर आधारित नहीं है. 

Saturday, September 21, 2013

मोह मिटाए रहें मगन

मार्च २००५ 
विपशना ध्यान बहुत सरल है. श्वासों को आते-जाते देखना, फिर धीरे-धीरे देह में होने वाले ऊर्जा प्रवाह को देखना. तरंगो को उत्पन्न होते फिर नष्ट होते देखना. कोई विचार उठा नहीं कि  भीतर उसके सापेक्ष कोई संवेदना जगी. कोई दुखद बात सुनी कि भीतर एक विषैला प्रवाह दुःख का दौड़ने लगता है, जैसे ही पता चला वह खबर असत्य थी, परिवर्तन होने लगता है लेकिन उस विष का प्रभाव तो देह को झेलना ही पड़ा. हम यदि मोह छोड़कर जगत में रहें तो दुःख को टिकने की जगह ही न मिले. इन विकारों का जन्म हमारे ही भीतर होता है क्योंकि घटनाएँ तो हर क्षण संसार में हो रही हैं, हमें वही प्रभावित करती हैं जिनसे हम मोह से बंधे हैं.  यदि मन सुख-दुःख के प्रति निरपेक्ष रहे, प्रतिक्रिया न करे तो भीतर ऊर्जा व्यर्थ नहीं होगी. जो क्रोध हमें भीतर जलाता है वही हम बाहर अन्यों पर कर सकते हैं. हमारी चेतना सुप्त ही रहती है जब हम अहंकार वश जीवन में होने वाली घटनाओं का सूत्रधार बनना चाहते हैं. सभी कुछ घटित हो रहा है, हम साक्षी हैं.  

Friday, September 20, 2013

मिला हुआ वह हर पल सबसे

मार्च २००५ 
किस तरह स्वयं को जगत के लिए उपयोगी बना सके, साधक को इसका भी ध्यान रखना चाहिए. एकांत साधना आरम्भ में तो ठीक है, जब नये-नये अनुभव होते हैं तो लगता है, एकमात्र उसे ही ईश्वर की कृपा का प्रसाद मिला है, पर नजरें उठाकर देखें तो पता चलता है, सृष्टि के आदि से अनेकों सन्त-महात्मा साधक हो गये, अभी भी हजारों-लाखों हैं, ईश्वर को पाना ही स्वाभाविक है, क्योकि वह कभी खोया ही नहीं था बल्कि उसे भूल जाना ही असम्भव है. साधना का लक्ष्य है कृपा का अनुभव और जब ऐसा लगने लगे तो स्वयं को लुटा देना चाहिए, जितनी-जितनी सेवा हो सके करनी चाहिए. यह जगत उससे अलग नहीं, जगत की अच्छाई-बुराई सब उसी से है. तीनों गुणों से बंधी प्रकृति के कारण प्राणी अपना-अपना कार्य कर रहे हैं, जो इस बंधन को काट सके वही साधक है. साक्षी भाव से तब वह इस व्यापर को देखता है, उससे लिप्त नहीं होता. 

Thursday, September 19, 2013

'मैं' से' 'मैं' तक

फरवरी २००५ 
प्रभु ! तू याद आता क्यों नहीं है
इस दिल में समाता क्यों नहीं है

हमारी सोच ‘मैं’ से शुरू होती है और ‘मैं’ पर खत्म भी होगी. हम जो भी कर्म कर रहे होते हैं चाहे वे अपने लिए हों या दूसरों के लिए, ‘मैं’ की धुरी के इर्द-गिर्द ही होते हैं. अस्तित्त्व से जुड़े बिना हमारे कार्यों, वाणी तथा विचारों में गहराई नहीं आती, हम सतही स्तर पर ही जीवन जिए चले जाते हैं, पर जब हम अपने भीतर की सत्यता का अनुभव करते हैं तो हमारा ‘मैं’ जो पहले संकीर्ण था, अब सब कुछ उसमें समा जाता है, जीवन जैसा आता है उसे वैसा स्वीकारने की क्षमता पैदा होती है. हमारे ‘स्व’ का विस्तार होता है, सभी के भीतर उसी एक अस्तित्त्व का दर्शन हमें होता है. 

Wednesday, September 18, 2013

हुकुम रजाई चालिए

फरवरी २००५ 
जब जीवन का लक्ष्य तय हो जाता है तो रास्ता मिलने लगता है, हमारे अंतर की सच्ची पुकार कभी भी अनसुनी नहीं रहती, परम पिता परमात्मा हमारे लिए वह सारे साधन जुटा देता है जो हमारे विकास के लिए आवश्यक हैं. हमारा जीवन प्रकृति के सूक्ष्म नियमों द्वारा संचालित होता है. पूर्व में किये गये कर्मों के अनुसार हमारे भावी कर्म नियत होते हैं, प्रमादवश मानव स्वयं को कर्ता मानता है, लेकिन वास्तव में प्रकृति के गुणों के अनुसार ही उसके कर्म होते हैं. साधक साधना के द्वारा इन गुणों के पार जाना चाहता है. चेतना में जगा हुआ जीव ही सचेत होकर कर्म करता है, जब वह गुणों के पार चला जाता है.