२३ जुलाई २०१८
जब तक हमारे पास समय है, देह में शक्ति है, मन में उत्साह है, तभी तक हम जीवित हैं,
ऐसा मानना चाहिए. एक कहानी हम सबने सुनी है कि रात्रि के अंधकार में एक व्यक्ति
नदी किनारे बैठकर एक-एककर पत्थर फेंकता रहा, जब प्रभात का प्रकाश जगा तो उसके हाथ
में एक ही पत्थर बचा था, जिसे देखकर वह चौंक गया, जो एक कीमती हीरा था. जीवन की
शाम ढले और हमें यह महसूस हो कि कीमती घड़ियाँ हाथ से फिसली जा रही हैं, उसके पूर्व
ही स्वयं के भीतर छिपे हीरे को पहचान लेना है. शांति और प्रेम का वह अनमोल रत्न
जिसकी पहचान मीरा को उसके सद्गुरु ने कराई थी, सभी के भीतर है, और उतना ही सच्चा
और अनमोल जितना किसी जागे हुए के भीतर होता है. जिसकी पहचान होते ही जीवन में
तृप्ति का अहसास होने लगता है. और जिसकी पहचान न होने तक मन एक तलाश में खोया रहता
है. मन जब एकाग्र होकर अपने आप में रुकना सीख जाता है, उसे संतुष्टि का अनुभव होने
लगता है, मानो वह हीरा हाथ लग गया जो सदा से अपने ही पास था.
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