Saturday, July 7, 2012

मूल से जुड़ना है


मई २००३ 

जब हम अपने स्थान से, अपने वास्तविक पद से हट जाते हैं तभी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं. निज स्थान से तो यह जग एक खिलौने की भांति प्रतीत होता है, इसका असली चेहरा प्रकट हो जाता है. यह ज्ञान अंतर में उदित होता है कि जिन वस्तुओं के लिये हम दिनरात एक कर देते हैं वे तो जड़ हैं, उनसे हमारी शोभा नहीं है. हमारा असली धन तो हमारे मन की स्थिरता, समता भाव, तथा अखंड शांति है, जो अच्युत है, जिसे कोई बाहरी आधार नहीं चाहिए जो अपने भीतर ही सहज प्राप्य है, जो हमारा मूल है. हमें खोल की नही मूल की परवाह होनी चाहिए. हमारा प्रत्येक कर्म वास्तव में उसी को पुष्ट करे, हम स्वयं के लिये अजनबी न बनें, समता का रस हमें स्थिर रखे, कोई घटना जाने अनजाने हमें मलिन न करे, प्रतिक्रिया नहीं अनुभूति मन में जगे. सहज अनुभूति.

एक यात्रा जीवन की


मई २००३ 
जीवन एक दीर्घ यात्रा है, और उसमें इस शरीर से मिला जीवन तो एक पड़ाव भर है, अगला जन्म यानि अगला पड़ाव. जैसे मंदिर में जाने के लिये सीढ़ियाँ होती हैं वैसे ही अपनी असली मंजिल पर जाने के लिये यह जीवन व मृत्यु सीढ़ी की तरह है. यहाँ कुछ भी चिरस्थायी नहीं है न ही हमारे साथ जाने वाला है सिवाय उस आत्मिक शांति के जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. ज्ञान ही हमारा लक्ष्य है और उस ज्ञान के पथ पर आत्मिक शांति फल है, प्रेम हमारा पाथेय है, और भक्ति शीतल जल. यह रास्ता बहुत दुर्गम होते हुए भी सरल है क्योंकि इस पर हमारे साथ परमात्मा चलते हैं वह पग-पग पर हमें सम्भालते हैं, उन्होंने हमें अकेला नहीं छोड़ा है, वह हर क्षण हमारे साथ हैं.

Friday, July 6, 2012

कर्म की कला


मई २००३ 
हमारे कर्म मात्र हमारा ही उत्थान-पतन नहीं करते हैं वरन् वे हमारे आसपास के वातावरण के उत्थान-पतन के प्रति जिम्मेदार हैं, हमारी संतति को भी वे प्रभावित करते हैं. कर्म शुद्ध होंगे तो भविष्य ज्ञानमय होगा. मूल्यों के प्रति प्रतिबद्दता होगी तो ही ज्ञान हमारा सहायक होगा, कोरा ज्ञान हमें कहीं नहीं ले जाता.  हमारे कर्म ही हमारे आंतरिक भावों को प्रकट करते हैं. मनसा-वाचा-कर्मणा जो एकरस है भीतर-बाहर एक सा उसे अपने कहे, किये या सोचे पर एक क्षण के लिये भी पछताना नहीं पड़ता. सहज भाव से जो भी मार्ग में आये उसे अपने विकास के लिये साधित कर लें तो जीवन में अर्थ की सुगन्धि भर जाती है.


Thursday, July 5, 2012

खोलनी हैं मन की जंजीरें


मई २००३ 
हमारे जीवन के लिये जो भी आवश्यक है, ईश्वर ने उसके भंडार खोल दिए हैं. धूप, हवा और पानी तथा इनसे ही उत्पन्न अन्न. यही तो हमें चाहिए, बजाय कृतज्ञ होने के हम अपने अभावों की तरफ दृष्टि डालते रहते रहते हैं. यही हमें बांधता है, मन की जंजीरें दिखाई नहीं पड़ती पर वे हैं बहुत मजबूत. जिन्हें हम स्वयं ही बांधते आये हैं, कितनी ही गाँठे हैं जो हम नित्य प्रति बांधते जाते हैं. सदगुरु की कृपा से ज्ञान का प्रकाश जब भीतर फैलता है तो सारे विकार स्पष्ट नजर आते हैं, वरना अहंकार का अँधेरा इतना गहना था कि कुछ सूझता ही नहीं था. सदगुरु दर्पण है जिसमें असलियत झलकती है. हमारे विकार चाहे कितने ही अधिक हों कृपा सदा उससे कहीं अधिक है सो शीघ्र ही जीवन में प्रकाश बरसता है... जीवन फिर एक उत्सव बन जाता है ..कभी खत्म न होने वाला उत्सव.


Wednesday, July 4, 2012

जल में घट, घट में जल


हमारे भीतर अनंत सम्भावनाएं छुपी हैं. हम परमात्मा के अंश होने के कारण उसकी अपरिमित शक्ति के हकदार हैं. साधना उसी शक्ति को प्रकट करती है. आनंद, सहजता, प्रेम, वर्तमान में रहने का गुण, कालातीत होना, उत्साह आदि गुण हमें इस पथ पर सहायक हैं. अहंकार सबसे बड़ी बाधा और विनम्रता सबसे पहली आवश्यकता है. हमारे पास जो कुछ भी है वह उसी का है. अभी वह हमें अपने से पृथक दिखाई पड़ता है, हमें उसकी चाह होती है. वही सब कुछ है यह जानते हुए भी अपने गुणों व उपलब्धियों पर चाहे वे कितनी भी नगण्य क्यों न हों, अभिमान कर बैठते हैं. ध्यान में भी वही है जीवन में भी वही है. हम बीच में आये कहाँ से, वास्तव में हम खुद को ही खोजने में लगे हैं और जब हम हैं ही नहीं तो खोजें किसे ? कबीर ने ऐसे ही कभी कहा होगा- घडे में पानी, पानी में घड़ा.... वह हममें है हम उसमें हैं, फिर कौन किसे मिले और कौन किससे मान करे ....?


Tuesday, July 3, 2012

पूर्णता की ओर


हमारी उत्पत्ति आनंद से हुई है, हम आनंद में ही जीते हैं, उसी में स्थित हैं, उसी को पाना हमारा लक्ष्य है. वह मस्ती, वह फक्कड़पन, वह अनुभूति जो ध्यान में होती है जब आँखें खोलने का भी मन नहीं होता, एक रस का स्रोत भीतर प्रवाहित होता सा लगता है, वही प्रेम है, वही सत्य है, जो अपना रूप कभी दिखाता है, कभी छिपा लेता है. उसके साथ एक बार यदि सम्बन्ध जुड़ जाये तो वह कभी बिछड़ता नहीं क्योंकि वही सत् है. संसार यदि मिल भी जाये तो वह छूटने वाला है क्योंकि वह असत् है, संसार परिवर्तनशील है, यह उत्पन्न होता है फिर नष्ट होता है. यहाँ संयोग भी है और वियोग भी है. लेकिन परम के साथ यदि एक बार संयोग हो गया तो कभी वियोग नहीं होता. वियोग प्रतीत होते हुए भी वह वह मधुर पीड़ा का अहसास कराता है. वे अश्रु जो उसके विरह में बहते हैं शीतल होते हैं. वह पूर्ण है और हम भी उसी पूर्णता की तलाश में हैं.


Sunday, July 1, 2012

भीतर बरसे जाता है वह


मई २००३ 
इस संसार से जो भी हम प्राप्त करते हैं उसके पीछे दुःख छिपा हुआ है. एक बार जब बुद्धि इस सत्य को जान लेती है तो भीतर गए बिना कोई रस्ता नहीं बचता और वहाँ आनंद बरस ही रहा है. उसके बाद जगत का दुःख सहन नहीं होता. तब सहज वैराग्य का जन्म होता है. और जब यह क्षण जीवन में आता है जीवन संगीतमय हो जाता है. अधरों से मुस्कुराहट कभी जाती नहीं. आँखों में एक रहस्य छिपा रहता है. तब जीवन में उपरति हो जाती है. हर कार्य एक खेल लगता है. तब जीना कितना सहज और सरल हो जाता है.