Tuesday, May 14, 2013

भक्ति करे कोई सूरमा


 सितम्बर २००४ 
 साधना के पथ पर कोई वीर ही चल सकता है, यहाँ कायरों का कोई काम नहीं, एक चुनौती है यह पथ, जिसे बहादुर ही स्वीकार सकते हैं. मन को निरंतर समता के पथ पर बनाये रखना कोई बच्चों का खेल नहीं है, कई बार साधक विफल होता है पर भीतर जो कचोट उठती है वही उसे पुनः पुन उठकर चलने को प्रेरित करती है. समता नष्ट होते ही अशांति का अनुभव होता है, जो मानव का मूल स्वभाव नहीं है. ईश्वर का मूल स्वभाव आनन्द है, उसने हमें भी अपने निज स्वरूप में बनाया है. जगत से प्राप्त हुई प्रसन्नता क्षणिक है, जो मन अनुभव करता है, पर मन आत्मा के सागर पर उठी लहर है जो अभी है, अभी नहीं, तभी कोई भी सुख हमें पूर्ण तृप्ति प्रदान नहीं करता. जब यह लहर स्वयं को आत्मा का ही एक रूप जानती है तब उसे ही चाहती है और तभी मन समता में टिकने  लगता है.   

Thursday, May 9, 2013

भाव पुष्प से होती पूजा


सितम्बर २००४ 
साधना का पथ अत्यंत दुष्कर है और उतना ही सरल भी. जिनका हृदय सरल है, जहाँ प्रेम है, ऐसे हृदय के लिए साधना का पथ फूलों से भरा है, पर राग-द्वेष जहाँ हों, अभाव खटकता हो, उसके लिए साधना का पथ कठोर हो जाता है. कृपा का अनुभव भी उसे नहीं हो पाता, क्योंकि कृपा का बीज तो श्रद्धा की भूमि में ही पनपता है, अनुर्वरक भूमि में नहीं. जहाँ हृदय में ईश्वर प्राप्ति की प्यास ही नहीं जगी वहाँ उसके प्रेम रूपी जल की बरसात हो या नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता, जब मन में एक मात्र चाह उसी की हो तभी भीतर प्रकाश जगता है. उस चाह की पूर्ति के लिए बाहरी साधनों की  आवश्यकता गौण है, वहाँ मन ही प्रमुख है, मन को ही प्रेम जल में नहला कर, भावनाओं के पुष्प, श्रद्धा का दीपक, आस्था का तिलक लगा कर शांति का मौन जप करना होता है. यह आंतरिक पूजा हमें उसकी निकटता का अनुभव कराती है, साधक तब धीरे-धीरे आगे बढता हुआ एक दिन पूर्ण समर्पण कर पाता है.

Wednesday, May 8, 2013

दीप जला है घट घट सुंदर


सितम्बर २००४ 
इस जगत में हम चाहे कितनी ही उपलब्धियाँ हासिल कर लें, यदि भीतर तृष्णा बनी हुई है तो वे सभी व्यर्थ हैं, हम यदि धन होने पर भी अभाव का अनुभव करें, शिक्षित होकर भी अज्ञान का प्रदर्शन करें, आस्तिक होके भी दुखी हों, तो हमारा धन, विद्वता, तथा धर्म सत्य नहीं हैं, कहीं न कहीं कोई भूल हो रही है. भीतर एक पूर्ण तृप्ति का अहसास ही एक मात्र ऐसी उपलब्धि है, जो पाने योग्य है. जीवन एक अनुपम उपहार है, जिसका हर क्षण आनंद का स्रोत बन सकता है. वह परम अस्तित्त्व, हमारा अपना आप अंतर में दीप जलाकर प्रतीक्षा रत है, हम बाहर से निरत होकर जैसे ही भीतर झांकते हैं, वह हमें बाहें फैलाये खड़े दीखता है. जिस क्षण उससे परिचय होता है, तत्क्षण एक अनोखी शांति बरसने लगती है. 

Monday, May 6, 2013

एक नाम ही अधारा...


सितम्बर २००४
हमारे जीवन में अध्यात्म का आना एक नियत समय पर होता है. इस ज्ञान को जिस क्षण हमने अपने हृदय में स्थापित कर लिया, उसी दिन से हमारे उद्धार की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. ज्ञान का आश्रय लेकर हम अपने इर्द-गिर्द बने झूठे आश्रयों से किनारा करते चलते हैं. हम जिस जगत का सहारा लेकर खड़े थे, वह तो स्वयं ही डगमगा रहा है, तो हमें क्या संभालेगा. ज्ञान ही सच्चा आश्रय है. ज्ञान तभी हृदय में टिकता है जब मन समाहित हो, वर्तमान में हो. एक हुए मन में कोई भेद नहीं रहता, तब विभिन्न नाम-रूपों में एक ही सत्ता के दर्शन होते हैं, तब कौन किससे चाहेगा या द्वेष करेगा. जब मन में कोई लहर नहीं उठती तब ही आत्मा अपना प्रकाश फैलाती है. व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति के प्रति सहज स्वीकार भाव हमारी ऊर्जा को बचाता है, जो मन को समाहित रखने में सहायक  होती है. 

बिखरा है चहुँ ओर वही तो


सितम्बर २००४ 
हमारा तन पांच तत्वों का बना हुआ है और हमारा मन प्रेम का, मन को हम देख नहीं सकते महसूस करते हैं, वैसे ही प्रेम को भी. जैसे विकारी मन दुःख देता है, शांत मन सुखकारी है, प्रेम भी यदि विकृत हो जाये अर्थात उसमे ईर्ष्या, क्रोध आदि के भाव समा जाएँ तो वह दुःख देता है. इन विकारों से रहित शुद्ध प्रेम हमें अपने भीतर ही खोजना होगा, तब वह सृष्टि के कण-कण में दिखाई देगा. वर्तमान के क्षणों में ही ऐसे प्रेम का अनुभव हो सकता है, क्योंकि वह बालवत निर्दोष होता है, उसे कुछ चाहिए नहीं, वह देना चाहता है. मृत्यु के क्षणों में भी प्रेम के कारण ही प्रेमी अनंत में समा  जाता है, फिर एक नया शरीर धारण करता है तो जगत से प्रेम के कारण ही.

Saturday, May 4, 2013

सबका भला मेरे राम जी करें


संतजन कहते हैं कि मानव पांच इन्द्रियों के राज्य के वासी हैं, खाना, देखना, सूंघना, सुनना और स्पर्श करना इन्हीं कृत्यों को करते हुए वे मूलाधार चक्र में ही रहते हैं. अहम् का जब विकास होता है तो परिवार आदि का पोषण करते हैं स्वाधिष्ठान चक्र में, स्वयं को मन का राजा मानकर मणिपुर में रहते हैं, अनहत तक आते-आते अहंकार कुछ बढ़ जाता है. विशुद्धि में देहाभिमान कुछ कम होता है, आज्ञा चक्र में वह पूरी तरह चला जाता है, सभी के साथ एकात्मकता का अनुभव साधक तब करता है. तब जीवन में ऐसे प्रेम का उदय होता है जो सर्वहित चाहता है. इससे पूर्व यदि परमात्मा का प्रेम हम अनुभव नहीं कर पाते तो केवल इसलिए कि हम उससे प्रेम नहीं सुविधाएँ चाहते हैं. मानवी प्रेम की तरह हम कुछ शर्तों के साथ उससे प्रेम करते हैं.  

Friday, May 3, 2013

एक चुप सौ सुख


अगस्त २००४ 
जगत में इस तरह रहें हम कि किसी को दुःख न पहुंचाएं, अज्ञान के कारण हम कभी-कभी अन्यों की भलाई की कामना रखते हुए भी उनको पीड़ा पहुँचा रहे होते हैं, हमारा अहम् हमें सच्चाई से दूर रखता है अथवा तो हममें इतनी योग्यता होती नहीं कि हम किसी पर अपना प्रेमपूर्ण अधिकार ही जतला सकें, तो सबसे अच्छा यही है कि हम मौन का आश्रय लें, कहने से अच्छा करना है, हमारे शब्दों से ज्यादा असर हमारे व्यवहार का अन्यों पर पड़ता है, प्रेम यदि हृदय में है तो उसे कहकर जताने की जरूरत नहीं, वह मौन से ज्यादा अच्छी तरह से व्यक्त होता है. हम सभी को प्रेम, आनंद व शांति की आवश्यकता है, क्योंकि वही हमारा मूल स्वरूप है, एक बार उसका अनुभव हो जाने के बाद जीवन एक क्रीड़ा स्थली हो जाता है. जिस तरह अतीत का अब हमारे लिए कोई महत्व नहीं वैसे ही एक दिन वर्तमान भी हो जाने वाला है, हम उसे खो दें, इसके पूर्व हमें भरपूर जीना है.