Tuesday, February 11, 2014

सेवा भी साधना है

अगस्त २००५ 
सेवा स्नेहवश होती है, वहाँ स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए, चाहिये तो केवल सेव्य की प्रसन्नता, सेवक यदि अपना सुख चाहे, अपनी रूचि को सेव्य पर लादे तो वह अपनी ही सेवा कर रहा है. हनुमान सेवक हैं, उनके प्रेम की धारा सदा आराध्य की ओर बहती है. वह राम की सेवा के अवसर खोजते हैं. हम लोग अपनी सुविधा देखकर सेवा करते हैं, तभी उसका फल नहीं मिलता. सच्ची सेवा करने से अन्तःकर्ण की शुद्ध होती है, अहंकार गलता है. सेवा हमें प्रभु के पास ले जा सकती है. 

Friday, February 7, 2014

रामकथा सम अमृत नाहीं

जुलाई २००५ 

कितना अद्भुत है वह परमात्मा जो हमारे भीतर छिपा है और प्रेम का ऐसा जाल बिछाता है कि कोमल हृदय उसमें बंध जाता है. ईश्वर का प्रेम अमूल्य है, अनुपम है, अद्भुत है, उसी के कारण तुलसी अमर काव्य की रचना करते हैं, सन्त कथावाचक बनते हैं और श्रोता सुनते-सुनते भाव की गंगा में डूबते उतरते हैं. ईश्वर की कृपा से ही उसका प्रेम मिलता है, सद्गुरु की कृपा से ही ईश्वर की कृपा मिलती है. राम ही आत्मा है, और लक्ष्मण विवेक, सीता प्रज्ञा है और हनुमान ज्ञान. हमारी आत्मा के चारों ओर अभी विवेक की जगह अविवेक है, प्रज्ञा की जगह अविद्या और ज्ञान की जगह अज्ञान, तभी राम भी दूर लगते हैं.

तोरा मन दर्पण कहलाये

जुलाई २००५ 
हमारा मन वास्तव में दर्पण है जो भीतर उठने वाले हर विचार को प्रतिबिम्बित करता है. हमारे अंतः करण का निर्माण प्रतिक्षण होता रहता है, कोई भी घटना जो भीतर घटी हो अथवा बाहर, प्रतिक्रिया जगाती है, यह प्रतिक्रिया राग या द्वेष दोनों में से ही कोई होती है. दोनों ही हमें बांधते हैं, यह जानते हुए भी हम स्वभाव वश प्रतिक्रिया करते हैं, अंतः करण को मैला करते हैं, वही हमारे मन में झलकता है और उसका संस्कार भी भीतर बन जाता है. जो भी घट रहा है उसे साक्षी भाव से देखने पर ही मन शांत रहता है और कोई बीज नहीं पड़ता. जिस व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति हम प्रतिक्रिया जगाते हैं अनजाने में हम उसके जैसे होने लगते हैं, अपने पद से नीचे गिर जाते हैं. साधना के पथ पर दो कदम आगे चले नहीं कि तीन कदम पीछे आ गये, तभी तो लक्ष्य दूर ही रहता है. मन में छाई हल्की सी धूमिल रेखा भी साधक को मान्य नहीं, वह प्रतिक्षण सहजावस्था में रहना चाहता है.  

Wednesday, February 5, 2014

कितना पावन सबका अंतर

जुलाई २००५ 
प्रेम सभी के भीतर लबालब भरा है, भीतर ही भीतर छलकता रहता है, सभी आत्मा रूप में कितने पावन हैं, निष्पाप, छल-कपट से रहित पर वही आत्मा जब मन के रूप में, विचारों के रूप में, कर्म के रूप में बाहर आती है तो कितनी बदल जाती है. वह प्रेम जो भीतर सहज है बाहर आकर कितना असहज हो जाता है. यह क्यों होता है इसका कारण खोजने जाएँ तो एक मात्र उत्तर मिलता है, अहंकार, बड़े-बड़े अक्षरों में चमकता हुआ अहंकार ! यही वह कारण है जो हमें असहज बनाता है, जो भीतर के प्रेम को बाहर बिखरने से रोक देता है. फूल अपनी सुगंध कितनी सहजता से बिखराता है पर हम मानव प्रकृति के सम्मुख कितने तुच्छ प्रतीत होते हैं, ऊपर से तुर्रा यह कि यह अहंकार हमें इतना प्रिय है कि परमात्मा की सत्ता को भी नकार देते हैं.

Tuesday, February 4, 2014

मन तू ज्योति समान अपना मूल पिछान

जुलाई २००५ 
हमारा जीवन जिन वस्तुओं से महत्वपूर्ण बनता है, उनमें सबसे प्रमुख है प्रेम ! भीतर जब प्रेम भरा रहता है तो बाहर सभी कुछ सरल हो जाता है और प्रेम जब हृदय का वासी बन जाता है तो बाहर एक शांति स्वतः ही प्रकट होती रहती है. हमारा मन तब समाधान पाना सीख लेता है. नम्रता से अहंता को, क्रोध को अक्रोध से, हिंसा को अहिंसा से जीतने की कला सीख लेता है. सार्थक चेष्टा से व्यर्थ अपने आप गिर जाता है, सार्थक चिन्तन से विषाद दूर हो जाता है. जो मन असत्य, परदोष दृष्टि तथा आत्मप्रशंसा को त्याग देता है, उसकी वाणी के दोष भी समाप्त होने लगते हैं. भ्रम दोष, प्रमाद दोष और लिप्सा दोष वाणी के दोष हैं. जिसके बारे में पूर्ण जानकारी न हो, ऐसी वाणी बोलना ही भ्रम दोष है, असजग होकर कहे गये वाक्य भूल से भरे होंगे. लोभ बढ़े तो वाणी का असर नहीं होता. ऐसा मन ही हमें भगवद्प्रेम का अनुभव करा सकता है, आत्मा को प्रकट करने के लिए सहायक हो सकता है. वह अपने मूल को पहचानने लगता है, वह भीतर जाने लगता है. 

मुक्त हुआ सो ज्ञानी

जुलाई २००५ 
ध्यान में स्वयं के बारे में सच्चाई प्रकट होती है. अपने को जाने बिना हमारे भीतर का संताप मिटने वाला नहीं है. श्वास के सहारे भीतर उतरने पर ही मुक्त अवस्था का अनुभव होता है, जहाँ देह का बोध नहीं रहता, मात्र चेतना का ही साम्राज्य रहता है. ज्ञात होता है कि चित्त ही काया बनता जाता है, हम देखते हैं जैसे ही चित्त पर कोई तरंग उठती है वैसे ही काया पर भी तरंगे उठती हैं. विकारों से मुक्ति तभी होती है, अनुभूति के स्तर पर जब हम विकार को गिरते हुए देखते हैं तो उसकी शक्ति खत्म होती जाती है. सत्य यही है कि भीतर जाकर ही हम विचारों से परे एक मुक्त अवस्था का अनुभव कर सकते हैं. 

Sunday, February 2, 2014

मुक्त रहें जो कर्तापन से

जुलाई २००५ 
हमारा सारा जीवन कर्मों की एक श्रृंखला ही तो है. मन जब निज केंद्र में रहना सीख जाता है, स्वयं में स्थित रहकर परमात्मा को पूर्ण समर्पित अनुभव करता है, तब कर्त्ता भाव से मुक्त होता है और तब वह भी उसी तरह सम्पूर्ण कार्यों को होते हुए देखता है जैसे कोई अन्य व्यक्ति. जब हम कर्तापन के भाव से दब जाते हैं तभी दुःख के भोक्ता बनते हैं. गुण-गुणों में बरत रहे हैं यह जानकर जब हम अलिप्त रहते हैं हमारे भीतर आनन्द की अजस्र धारा निरंतर बहती रहती है. एक क्षण का भी व्यवधान उसमें हुआ तो साधक को सहन नहीं होता.