Friday, July 8, 2011

विवेकी जन


सितम्बर २००० 
विवेकी को इस जगत से या परमात्मा से कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती, वह तो पूर्ण हो चुका होता है. उसे कुछ पाना शेष नहीं रहता बल्कि छोड़ना ही शेष रहता है. संसार में आसक्ति को छोड़ना, सुख बुद्धि को छोड़ना, विकारों को छोड़ना और धीरे-धीरे काल्पनिक वृत्तियों को त्याग कर अपने आप में ठहर जाना. वह अपने सुख-दुःख के लिये स्वयं को जिम्मेदार मानता है, मानता ही नहीं बल्कि जानता है, क्योंकि विवेकी कोई भी निर्णय स्वयं के अनुभव के आधार पर करता है. 

Thursday, July 7, 2011

प्रेम और मोह

अगस्त २००० 
प्रेम एक व्यापक तत्व है, समुन्दर की तरह विशाल और आकाश की तरह निस्सीम ! जहाँ भी, जिसके भी हृदय में प्रेम होगा वह सबके लिये, प्राणी मात्र के लिये होगा. मोह एक संकीर्ण धारा की तरह है. मोह बंधन में डालता है जबकि प्रेम मुक्त करता है. नीला आकाश हमारी आत्मा का मूल स्वभाव है, स्वच्छ, निर्मल, मुक्त और असीम. विचारों के बादल उसे आच्छादित कर भी लें तो भी हमें उसकी स्मृति को बनाये रखना है प्रतिक्षण, प्रतिपल ! हमारा मन जो चारों दिशाओं में बिखरा-बिखरा सा रहता है उसे एकत्र करना है, एक रूप देना है. यह संसार जैसा हमें दिखाई देता है वास्तव में वैसा है नहीं. पल-पल बदलते इस संसार को बस साक्षी भाव से देखते जाना है. प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण है, देर-सबेर सत्य अपने-आप ही सम्मुख आ जाता है, सत्य की स्थापना नहीं करनी पड़ती वह तो स्वयंभू है. 

Wednesday, July 6, 2011

मन से परे


यदि कोई सुख और शांति चाहता है तो उसे आध्यात्मिकता को अपनाना ही होगा. अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर उतरना, भीतर का संयोजन, शोधन व आत्म विश्लेषण. ऊपरी मन बहुरुपिया है, कभी उत्थान की ओर जाता है कभी पतन की ओर ले जाता है. कभी संयमी हो जाता है कभी विलासी. मात्र इसके सहारे रहे तो हम कभी शाश्वत सुख नहीं पा सकते. इससे परे एक ऐसा मन भी हमारे पास है जो निर्विकार है. जहाँ उतर-चढ़ाव नहीं हैं, जो परम आनंद का स्रोत है. अभ्यास व वैराग्य के द्वारा वहाँ तक पहुंचना ही अध्यात्म है. 

Tuesday, July 5, 2011

अनंत की चाह


अगस्त २००० 
मन की आसक्ति को, चाह को, प्रेम को अगर दिशा मिल जाये, भावनाओं को विचारों को केन्द्र मिल जाये तो जीने की कला अपने आप ही आ जाती है, यदि चाह नश्वर की हो तो सुख भी नश्वर ही तो मिलेगा, मन में अनंत की चाह हो तभी अनंत की ओर कदम बढ़ेंगे. जहाँ योग नहीं वहाँ भोग होगा और रोग भी हो सकता है. जहाँ राम नहीं वहाँ कामनाएँ होंगी जो अशांति का कारण बनेंगी... जीवन का संघर्ष द्वंद्वात्मक है, किन्तु परमात्मा सदा एक सा है.

Monday, July 4, 2011

जड़ व चेतन


अगस्त २००० 
जब हम स्थूल का चिन्तन करते हैं तो बुद्धि भी जड़ हो जाती है, प्रमाद मन की जड़ता है, यह वह स्थिति है जब मन परम चेतन के प्रति उदासीन है. सूक्ष्म का चिन्तन करने से बुद्धि चेतन होती है. जगत का चिंतन स्थूल है और जगदीश का सूक्ष्म. जैसे जब पानी वाष्पीकृत होता है तो उसकी शक्ति बढ़ जाती है, जमने पर घट जाती है. हम सारा जीवन एक आयाम को देखते –देखते ही बिता देते हैं, दूसरे आयाम की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता. परिधि पर ही रह जाते हैं, अपने केन्द्र को छू नहीं पाते. तभी जीवन में एक अधूरेपन का अनुभव होता है, पूर्णता की चाह बनी रहती है. अपनी पूरी ऊर्जा व ऊष्मा को पाने का अर्थ है चेतन बने रहना. एक सरिता की तरह सातत्य रूप से गतिमान रहना. स्फूर्तिवान होकर मन में नैसर्गिक व सद्कार्यों के प्रति सदप्रवृत्ति जगे रहना. 

Friday, July 1, 2011

बुद्धि कैसी हो


मैं, मेरे का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन करने वाली बुद्धि अनर्थकारिणी है. परमार्थ तत्व को मानने वाली, विवेक व वैराग्य उत्पन्न करने वाली, ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसंधान करने वाली, प्रकृति के रहस्यों को समझने व सराहने वाली बुद्धि अर्थकारिणी है. ईश्वर का ऐश्वर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है, ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और उस पर स्थित बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, जंगल के रूप में और उसका वैभव फलों के मधुर रस, पंछियों की मधुर बोली, और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है, इस अनंत ईश्वरीय प्रसाद की कद्र करने वाली बुद्धि अर्थकारिणी है. 

मन और आत्मा


जुलाई २००० 

जैसे तरंग सागर में है और सागर तरंग में है, वैसे ही हमारा मन आत्मा में और आत्मा मन में है. यदि यह स्मरण सदा बना रहे बल्कि अपना अनुभव हो जाये तो हम व्यर्थ की चेष्टाओं से बचे रहेंगे, अपने सामर्थ्य व शक्ति का सही उपयोग हम कर सकेंगे. अभी तो हमारा बहुत सा वक्त पानी को कूटने जैसी व्यर्थ क्रियाओं में चला जाता है. अपने मन की चाबी व्यक्ति, वस्तु तथा परिस्थिति को सौंप कर हमने स्वयं ही परतंत्रता मोल ले ली है, जबकि हमारा सत्य स्वरूप शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सद चित आनंद है.