Friday, March 1, 2013

मन अनंत अनंत ही चाहे


मई २००४ 
हम यदि विकारों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते तो कहीं न कहीं सीमाकरण तो करना ही होगा, धीरे-धीरे इस सीमा को बढ़ाते जाना है. हम सुख-दुःख से परे उस परम आनंद को यदि अपना आश्रय स्थल बनाना चाहते हैं तो संयम और अनुशासन पहला कदम है. उन्मुक्त जीवन में मन भी उडा-उड़ा सा ही रहेगा. ऐसे मन में बुद्धि स्थिर नहीं रहेगी, स्थिर बुद्धि में ही आत्मा प्रतिबिंबित होती है. ईश्वर स्वयं हमें अपना आनंद प्रदान करना चाहते हैं, उसकी शक्ति ही हमें जीवित रखे हुए है, पर इस बात को हम नहीं मानते, उसके प्रति कृतज्ञता के भाव हमारे भीतर नहीं उमड़ते. इतने पर भी वह हमें प्रेम करता है, हमारी सोयी हुई शक्तियों को जगाना चाहता है, हमारे माध्यम से प्रकट होना चाहता है, हमारे धैर्य समाप्त होने की अनंत काल से प्रतीक्षा कर रहा है, कि कितने वर्षों तक हम उससे दूर रह सकते हैं, हम कितने निस्वार्थी हैं कि ईश्वर का सान्निध्य भी नहीं चाहते, लेकिन जगत जो सीमित है वह असीम मन को आनन्दित कैसे कर सकता है.

10 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर और शिक्षाप्रद.

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  2. सही कहा सीढ़ी दर सीढ़ी ही बढ़ा जा सकता है ।

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (02-03-2013) के चर्चा मंच 1172 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  4. स्थिर बुद्धि में ही आत्मा प्रतिबिंबित होती है.
    सत्या कथन ...
    शुभकामनायें ।

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  5. परम आनंद को यदि अपना आश्रय स्थल बनाना चाहते हैं तो संयम और अनुशासन पहला कदम है.
    RECENT POST: पिता.

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  6. मन की इच्छाओं का कोई अंत नहीं ...
    बधाई स्वीकारे मेम....

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  7. परमानन्द, आनंद प्राप्ति की पराकाष्ठा ,यही शायद ईश्वरीय स्थिति -ईश्वर!
    latest post होली

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  8. ईश्वर का सान्निध्य भी नहीं चाहते, लेकिन जगत जो सीमित है वह असीम मन को आनन्दित कैसे कर सकता है.

    लेकिन इससे हम मुक्त भी कहाँ हो पाते हैं।

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    1. एक बार यह सत्य मन समझ गया कि उसको संसार से तृप्ति नहीं मिल सकती भीतर परिवर्तन होने लगता है.

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  9. राजेन्द्र जी, इमरान, कालीपद जी, रमाकांत जी, धीरेन्द्र जी, अनुपमा जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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