Sunday, March 31, 2013

जगता है जब भीतर प्रेम


जून २००४ 
प्रेम से परिवर्तन सम्भव है, प्रेम हमारे भीतर एक क्रांति का उदय करता है, हम भीतर पिघल जाते हैं. गुरु के चरणों में जब हमारा सिर झुकता है तो भीतर एक घटना घटती है, अपने सुख-दुःख, पाप-पुन्य, गुण-अवगुण सभी को गुरु अथवा ईश चरणों में समर्पित करके जब हम मुक्त हो जाते हैं तो कृपा का बादल मन के आंगन में बरसता है, अंतर भीग जाता है और प्रेम की उर्जा भीतर उदय होती है. हम अपने स्वभाव को पा जाते हैं, प्रेम हमें हमारे स्वभाव से मिलाता है, वास्तव में हम दूसरे को प्रेम कर नहीं होते अपनी आत्मा से ही कर रहे होते हैं, क्योंकि सीधे-सीधे उस तक हमारी पहुंच नहीं है, हमें दूसरे के वाया जाना पड़ता है, सभी के भीतर वही स्वभाव है, जो प्रेम का स्रोत है. सच्चा प्रेम वहीं से उपजता है और वहीं पहुंच जाता है.

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर और उतना ही सार्थक भी .....!!
    आभार अनीता जी ...!!

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    1. अनुपमा जी, स्वागत व आभार !

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार2/4/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है

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    1. राजेश जी, बहुत बहुत आभार !

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