Sunday, April 14, 2013

खुद की याद जिसे आ जाये



हमारा जीवन स्वयं के लिए जब आनंददायी हो जायेगा तब ही हमारा होना सार्थक होगा हमारे परिवेश के लिए. हमारा हर पल जब उस परमपिता की स्मृति से पूर्ण होगा, तभी वह आनंदमय होगा. हम अपने प्रतिदिन के कार्यों में इतने उलझ जाते हैं कि अपनी स्मृति ही भुला देते हैं. मिथ्या अहंकार के तल से दुनिया को और स्वयं को देखते हैं. ईश्वरीय चेतना से ओतप्रोत हम स्वयं को उससे अलग मानने की भूल करते हैं तभी संशय की उत्पत्ति होती है, मन के दर्पण पर धूल छा जाती है. पर जब हमें कुछ सीखने की ललक उठती है, तब जगत ही हमारा गुरु बन जाता है. हमारा व्यवहार क्षेत्र ही हमारी कसौटी है. हमारा मन जब आत्मा के आनंद में सराबोर होकर कुछ भी बोलेगा तो वह सहज होगा और अहंकार से बोलेगा तो तो वह दुःख का कारण ही बनेगा. 

8 comments:

  1. हमार व्यवहार क्षेत्र ही हमारी कसौटी है. हमारा मन जब आत्मा के आनंद में सराबोर होकर कुछ भी बोलेगा तो वह सहज होगा और अहंकार से बोलेगा तो तो वह दुःख का कारण ही बनेगा. ...बहुत सुन्दर

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  2. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति,आपका सादर आभार.

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १६ /४/ १३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

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  4. मिथ्या अहंकार के तल से दुनिया को और स्वयं को देखते हैं. ईश्वरीय चेतना से ओतप्रोत हम स्वयं को उससे अलग मानने की भूल करते हैं तभी संशय की उत्पत्ति होती है,

    saty wachan

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  5. अपने स्वयं को जान ले तो सारी द्विधायें खत्म हो जाएँ !

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  6. उपासना जी, राजेन्द्र जी, राजेश जी, रमाकांत जी व प्रतिभा जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  7. ईश्वरीय चेतना से ओतप्रोत हम स्वयं को उससे अलग मानने की भूल करते हैं तभी संशय की उत्पत्ति होती है, मन के दर्पण पर धूल छा जाती है. पर जब हमें कुछ सीखने की ललक उठती है, तब जगत ही हमारा गुरु बन जाता है.

    सुन्दर

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  8. Hm ktne hi pal apne chinta mein vytit kr dte h ar chinta wse bhi bhi chita k snaan mani gyi h.agr hm chinta ki jgh atm chintan kre to us anand ki prapti ho jye jski hme tlaash h...

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