Saturday, July 14, 2012

एक रहस्य सबके भीतर


साधक को किसी भी बात पर परेशानी होती ही नहीं, आनंद का स्रोत यदि भीतर मिल गया हो तो छोटी-छोटी बातों का असर नहीं होता, हम किसी महान उद्देश्य को पाने के लिये यहाँ भेजे गए हैं. वह रहस्य हमारे भीतर है, उसके ही निकट हमें जाना है, जीवन के हर पल का उपयोग उस परम सत्य की खोज में हो सके तो ही जीवन सफल है. हमारा रोजमर्रा का कार्य भी उसी ओर इंगित करे, हमारे विचार, हमारा आचरण भी वही दर्शाये, हम जो भी अनुभव करें, सच्चे मन से करें, सजग होकर करें,  विवेक को जगाएं. मिथ्या अहं को त्याग कर जीवन को एक विराट परिदृश्य में देखें. हम सभी श्वास के द्वारा एक दूसरे से जुड़े हैं, हमारी चेतना परम चेतना का ही अंश है. हम अपरिमित शक्ति के स्वामी हैं !


11 comments:

  1. बहुत सुन्दर ...एवम ज्ञानवर्धक ....!!

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  2. मिथ्या अहं को त्याग कर जीवन को एक विराट परिदृश्य में देखें.

    मा वद मिथ्या मा भव मानी

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  3. और यह रहस्य ही सत्य है

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  4. यही है, अंतर में आनन्द है तो हर ओर आनन्द है!

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    1. अनुराग जी, आपने बहुत सही कहा है, हम आनंदित हैं तो सारा जगत आनन्दित प्रतीत होता है...

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  5. प्रस्तुति अच्छी लगी। मेरे नए पोस्ट "अतीत से वर्तमान तक का सफर पर" आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  6. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  7. अनुपमा जी, रमाकांत जी, व प्रेम सरोवर जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  8. सुन्दर और गहन विचार।

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  9. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/07/blog-post_7659.html

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