जनवरी २००७
हमारा मन तरल है, इसे जहाँ लगायें वह वैसा ही आकार ग्रहण लेता
है. यह वही सोचता है वही कहता है, वही करता है जो हमने इसे सिखाया है. जैसे
संस्कार हमने इसे दिए हैं वैसा ही यह बन जाता है. मन से बड़ा मित्र कोई नहीं और
इससे बड़ा शत्रु भी कोई नहीं. जब तक इसमें आनन्द की कोंपलें नहीं खिलीं तब तक मन
कृतज्ञता के गीत नहीं गाता, और जब तक कृतज्ञता के गीत नहीं गाता तब तक कृपा की
वर्षा नहीं होती, कृपा से ही आनंद स्थायी होता है. जो मन स्वयं से दूर हो जाता है
वह दुखी हो जाता है.