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Tuesday, May 21, 2013

महावीर की अनुपम वाणी


सितम्बर २००४ 
जैनधर्म का अनेकांत सिद्धांत कहता है कि किसी भी घटना को अनेक कोणों से देखकर ही उसके बारे में राय देनी चाहिए. किसी व्यक्ति के बारे में भी कुछ कहते समय प्रतिपक्ष की राय भी देखनी होगी, एकांगी दृष्टिकोण हमें अहंकारी बनाता है. समाज में रहते हुए हमें अनेकों की सहायता लेनी पडती है. एक-दूसरे से हमें कुछ अपेक्षाएं  होती हैं, हमारा जीवन ऐसा हो कि किसी के लिए असहजता का कारण न बने. क्योंकि वास्तव में यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं, एक ही है जो अनेक होकर दीखता है, हम किसी को दुखी करके स्वयं को ही दुःख पहुंचाते हैं.