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Wednesday, December 14, 2016

जगे चेतना भीतर ऐसी

१५ दिसम्बर २०१६ 
जीवन में कई बार ऐसा होता है जब हम दोराहे पर खड़े होते हैं. एक रास्ता जाना-पहचाना होता है, जिस पर चल कर हम कहीं भी तो नहीं पहुंचते  पर रास्ते का न तो कोई भय होता है न ही कोई दुविधा, दूसरा मार्ग अपरिचित होता है, वह कहाँ ले जायेगा ज्ञात नहीं होता उस पर चलने के लिए विरोध सहने का साहस भी चाहिए और मार्ग की कठिनाइयों का सामना करने की हिम्मत भी. अक्सर हम पहला  मार्ग ही चुन लेते हैं क्योंकि इसमें कोई जोखिम नहीं है और नतीजा यह होता है हम वहीं रह जाते हैं जहाँ थे. जीवन हमें कई बार अवसर देता है पर किसी न किसी तरह का भय हमें आगे बढ़ने से रोक लेता है. क्या ये सारे भय हमारे मन की दुर्बलता के परिचायक नहीं हैं. भीतर एक चेतना ऐसी भी है जो चट्टान की नाईं हर विरोध का सामना कर सकती है पर उसका हमें कोई स्मरण ही नहीं है.