जनवरी २००७
परमात्मा की कृपा अहैतुकी है, वे कृपा स्वरूप ही हैं बस ग्रहण करने
वाला मन होना चाहिए. साधक के जीवन में जब तप होता है तब ऐसा मन तैयार होता है.
अक्रोध भी एक तप है और अमानी होना भी. वह कृपा आकाश की तरह व सुगंध की तरह हमारे
चारों ओर है, हमें चाहिए कि चकोर या भ्रमर बनें और उसे ग्रहण करें. गुरू तो ज्ञान
का अमृत बरसा रहे हैं, हमें अपना बर्तन खाली करना है. वे तो बरस ही रहे हैं, हमारा
दामन फटा न हो. जीवन को कैसे हम और सुंदर बनाएं, कैसे दूसरों के काम आयें, कैसे
सदा हम शांत रहें, भीतर से खाली, हल्के और निर्भार ! यहाँ हम कुछ भी तो नहीं लाये
थे जो खोने का डर हो, शरीर अमर तो है नहीं जो मरने का डर हो. जो आत्मा अमर है वह
तो मरने वाला नहीं फिर कैसा डर ? परमात्मा है, और हम उसके अंश हैं, यह बात तो तय
है, वह न जाने कितनी तरह से अपनी उपस्थिति जता चुका है. वह हर क्षण हमारे इर्द-गिर्द
ही रहता है, उसे भी तो हमारी प्रतीक्षा है. वह हमारे द्वारा ही प्रेम पाना चाहता
है.