५ नवम्बर २०१७
भगवद्गीता
में श्रीकृष्ण कहते हैं, स्वधर्म में मरना भी पड़े तो ठीक है परधर्म नहीं अपनाना
चाहिए. स्वधर्म का अर्थ यदि हम बाहरी संप्रदाय को लेते हैं, तो उचित नहीं जान
पड़ता. स्वधर्म का अर्थ है निज धर्म यानि आत्मा का सहज धर्म. देह, मन, बुद्धि आदि
का धर्म ही परधर्म है. आत्मा शांति, प्रेम और आनंद स्वरूप है. आत्मा अविनाशी,
अविकारी है. यदि कोई स्वयं को देह मानकर मरने वाला समझता है तो यही परधर्म को
अपनाना है. मन मानकर सुख-दुखी होता है या बुद्धि मानकर हानि-लाभ की भाषा में सोचता
है तो वह अपने स्वधर्म से विचलित हो गया. कोई यदि स्वयं को अनंत, स्थिर और विमल
मानता है तो ही वह आत्मा के धर्म वाला अर्थात स्वधर्म में स्थित कहा जायेगा.