फरवरी २००७
जो चेतना स्वाधीन है, वह शांत है. जो चेतना पराधीन है वह
बेचैन होती है. चाह हमें पराधीन बनाती है और जो काम हम बिना चाह के करते हैं वह भी
पराधीन चेतना की निशानी है. अहंकार के लिए भी दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है,
आत्मसम्मान के लिए कोई अन्य नहीं चाहिए. भीतर से जो संतोष प्रकट होता है, रंजन की
शक्ति होती है, वही स्वाधीन चेतना से झरती है.