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Saturday, February 4, 2012

ईश्वर एक है


नवम्बर २००२ 
मुहम्मद भी अपने है, बेहद प्यारे और आत्मा के करीब, उनके बारे में सुनी कहानियाँ कितनी अद्भुत हैं. हम दूसरे धर्मों के बारे में बिना जाने ही अपनी धारणा बना लेते हैं जबकि सभी धर्म ईश्वर की ओर ले जाते हैं. वह ईश्वर जो सृष्टिकर्ता है, जो एक है जो सभी का है जो प्रेम से ओतप्रोत है जो आनंद दाता है. जिसने प्रेम में ही यह सृष्टि बनायी है और आनंद स्वरूप इस रूह को अपने अंश के रूप में बनाया, इस अद्भुत ज्ञान को भुलाकर क्यों मानव भौतिक सुखों के पीछे स्वयं को तथा अन्यों को भी दुखी करता है. आत्मिक स्तर पर तो सभी एक हैं कौन किससे बैर करेगा कौन किससे प्रतिस्पर्धा करेगा. नन्हें शिशुओं की तरह निष्पाप आत्मा हमें प्रभु प्रदान करता है पर जीवन भर हम उस पर क्रोध, लोभ, और वैमनस्य के धब्बे लगाते ही जाते हैं और फिर वह इतनी बदरंग हो जाती है कि हम उससे बचना चाहते हैं. दूने जोश के साथ प्रवृति में खुद को जोत लेते हैं. लेकिन भीतर-भीतर हमारी आत्मा सजग तो रहती ही है, ज्ञान के जल से उसे धोकर भक्ति के वस्त्र से पोंछ कर, सदगुरु की शरण में जाकर हम उससे पुनः परिचित होते हैं. परमात्मा का प्रेम हमें चारों ओर से घेर लेता है.