अगस्त २००७
सर्वोत्तम
पद है मानव का पद ! क्या हमने इस पद की शपथ ग्रहण की है ? इस शपथ में हमें
नकारात्मक भाव से मुक्त रहना, कटु वचन नहीं कहना तथा सभी को प्रेम देना इन तीनों
बातों को शामिल करना है. हमें इस शपथ रूपी संकल्प की छत बनानी है ताकि कोई विकार
प्रवेश न कर सके. व्रत लेने से मन खाली रहता है, यह व्यर्थ की बातों से नहीं भरता.
नया कार्य, नई कल्पना, नया चिन्तन तभी मन में आ सकती है जब पुराना वहाँ न हो. जगह
हो. जब मन ख़ाली होता है तो आत्मा मुखरित हो जाती है. मन बाह्य संसार से ही विकारों
को ग्रहण करता है यदि व्रत रूपी छत या आवरण रहे तो विकारों की वर्षा से हम बच सकते
हैं. अनावश्यक बातों को त्याग कर आवश्यक को ही हम ग्रहण करें तो कितनी ऊर्जा बचा
सकते हैं फिर वही ऊर्जा भीतर जाने में सहायक होती है और हम मनुष्यत्व के पद की
प्रतिष्ठा तभी बनाये रख सकते हैं.