जून २००४
मन की सौम्यता बनाये रखना ही
अध्यात्म का लक्ष्य है, हमारा मन जब संसार की ओर उन्मुख होता है तो अपनी सौम्यता
खो सकता है यदि सचेत न रहा, जब भीतर जाता है तो शांत अवस्था को प्राप्त होता है
यदि सजग रहा, वहीं उसका वास्तविक घर है, जहाँ उसे पूर्ण विश्राम मिलता है. संतजन
कहते हैं शरीर तो वह उपकरण है जो आत्मा को अपनी गरिमा प्रदान करने के लिए मिला है,
मन भी वह उपकरण है जो उच्च चिंतन व मनन करने के लिए मिला है, व्यर्थ चिंतन करके
सुखी-दुखी होने के लिए नहीं है. भीतर जाकर जो लौटा है उसके लिए संसार स्वप्न की
भांति हो जाता है. वह स्वाधीन हो जाता है,
मुक्ति का सुख निराला है, जो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता.