जून २००५
हमारे
अंतर्मन की गहराइयों में कितना कुछ छिपा है, एक संस्कार जगते ही उसके पीछे विचारों
की एक श्रृंखला जग जाती है. ऊपर-ऊपर से हम कहते हैं कि हम देह नहीं है आत्मा हैं,
पर भीतर जाकर पता चलता है, हमारा चिपकाव देह, मन, बुद्धि से कितना गहरा है.
प्रतिक्रिया का अर्थ है हम मुक्त नहीं हुए, भीतर उस वक्त भी बोध रहे कि हम कैसी
प्रतिक्रिया जगा रहे हैं, क्रोध करते समय यह भान रहे कि यह क्रोध है तो धीरे-धीरे
हम उससे मुक्त हो जाते हैं. हमें सूक्ष्मता से अपना निरीक्षण करना होगा, तभी आत्मा
का सूर्य हमारे भीतर जगमगा उठेगा, कितनी परतें है हमारे जीवन की, देह, प्राण, मन,
बुद्धि, स्मृति, अहंकार. प्रकृति के इन रूपों में कब तक उलझते रहेंगे, वह नित्य
नवीन है पर परिवर्तनशील है, आत्मा अबदल है, सदा एक सा है, वह ज्ञान, प्रेम तथा
आनन्द का अनंत भंडार है, उसको ही हमें जानना है जिसे जानकर कबीर, मीरा, सुर,
तुलसी, नानक, बुद्ध मुक्त हो गये, सद्गुरु भी हमें वहीं से पुकार रहे हैं.