कोरोना वायरस जीवित नहीं है, इसलिए इसे मारा भी नहीं जा सकता. उसकी यही रणनीति उसे अजेय बना रही है कि आज सारा विश्व उससे भयभीत है. योग वशिष्ठ में एक दैत्य की कथा आती है जो मारा नहीं जा सकता था क्योंकि उसमें अपने होने का अहसास ही नहीं था, वह एक रोबोट की तरह अपने मालिक की आज्ञा का पालन मात्र कर रहा था. देवताओं को जब उसे मारने में असफलता ही मिल रही थी, तो उन्हें सुझाया गया, उस दैत्य में अहंकार पैदा करो, तभी वह मरेगा. कोविड -19 को जिन्दा करना हो तो उसे मानव देह में ही किया जा सकता है, लेकिन जैसे ही यह एक मानव के भीतर प्रवेश करता है, उसकी कोशिकाओं को खुद के लाखों और संस्करण बनाने के लिए अपहरण कर लेता है। एक और बात जो इसे भयावह बनाती है, रोगी को उसके प्रवेश का पता ही नहीं चलता क्योंकि कोई भी लक्षण नहीं मिलते, पर उसके पूर्व ही वायरस कई अन्य व्यक्तियों को अपना शिकार बना चुका होता है. यह वायरस पहले दो स्थानों को संक्रमित करता है, नाक और गला, फिर यह फेफड़ों में प्रवेश करता है, जहां यह कम आसानी से फैलता है लेकिन बहुत अधिक घातक होता है। जब यह नासिका या गले में रहता है, आसानी से खांसी या छींक द्वारा वातावरण में फ़ैल जाता है, लेकिन कुछ रोगियों में, यह फेफड़े के भीतर खुद को गहरा ले जा सकता है, जहां रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। इससे बचने का एकमात्र उपाय है कि हम संक्रमित व्यक्तियों के सम्पर्क में न आएं और न ही किसी को संक्रमित करें. इसके लिए घर में रहना ही सबसे कारगर उपाय है.
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Tuesday, March 24, 2020
Monday, March 24, 2014
कृपा बरसती हर पल उसकी
जब हमारे जीवन में कोई
ऐसा दुःख आता है जिसका प्रतिकार हमारे हाथ में नहीं होता, हम असहाय हो जाते हैं तो
एक तरह से वह ईश्वर का वरदान ही होता है. हम निरहंकारी होकर उसके सम्मुख
आत्मसमपर्ण कर देते हैं. उसकी ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी मानते हैं, हम ईश्वर के प्रति
धनभागी होते हैं, कृतज्ञ होते हैं कि उसके निकट आने का कैसा सुअवसर उसने दिया.
सुखों में खोकर तो हम उसे भुला ही देते हैं और समर्थता हममें अहंकार को भर देती
है. हमें अपने स्वस्थ, सबल होने का जब अहंकार हो जाता है जब रोगी व्यक्ति हमारी
सहानुभूति का पात्र नहीं हो पाते तो ईश्वर हमें भी उनके समकक्ष लाकर बिठा देते हैं
ताकि हम अहंकार वश अपना ही नुकसान न करें. यदि हमारा लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है तो
इस मार्ग में आने वाली सारी रुकावटों को दूर करने का काम प्रभु स्वयं करते हैं. वह
सर्व समर्थ हैं, उनसे हमारा अटूट संबंध है. हम मानव होने के नाते उनकी सन्तान हैं,
उनका अंश हैं, उन्हीं की तरह आनन्द स्वरूप हैं. यदि हम स्वयं को देह ही मानते रहे
तो दुखी रहेंगे, मन या बुद्धि मानते रहें तो भी हमारे दुखों का अंत नहीं. जैसे ही
हम स्वयं को आत्मा मानते हैं, हमारे सारे दुखों का अंत हो जाता है. यह देह तथा मन
अस्थायी हैं, पल-पल बदल रहे हैं, न जाने कितनी बार हमने देह छोड़कर नई देह धारण की
है. एक दिन इस देह को भी छोड़ना है, उसकी तैयारी अभी से हमें करनी है.
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