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Monday, October 17, 2011

अहंकार


मई २००२ 

अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है. कई बार हमें लगता है कि हम इससे मुक्त हो रहे हैं. पर इसकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि थोड़ा सा अनुकूल अवसर पाने पर यह अंकुरित हो जाती हैं. हमारा अहं ही ईश्वर और हमारे बीच दीवार बन कर खड़ा है. ईश्वर कितने उपायों से इसे तोड़ना सिखाते हैं पर हम उनसे ही नाराज हो जाते हैं. जीवन में जब भी हमें मानसिक उद्वेग या पीड़ा का अनुभव होता है इसके पीछे हमारा अहंकार ही जिम्मेदार है. ऊपर से तुर्रा यह कि अहं सत्य नहीं है, इसकी परत दर परत खोलते चले जाएँ तो वहाँ कुछ बचता नहीं. स्वयं को कुछ साबित करना इसी अहं का ही एक रूप है. यदि हम खाली होकर प्रभु द्वार पर जायेंगे तभी कुछ पा सकते हैं, पूर्ण विनम्र होकर ही परम को रिझाया जा सकता है.