प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से ब्रज, अवधी व मैथिली आदि विभिन्न रूपों में परिवर्तित होती हुई हिंदी को आज हम जिस रूप में देखते हैं, उसको यहां तक पहुँचाने में हिंदी भाषा के कवियों का बहुत बड़ा योगदान है. कबीर, रैदास, सूर, मीरा, तुलसी, बिहारी, भारतेंदु हरिश्चंद्र से होती हुई हिन्दी की यह धारा मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला, पन्त, महादेवी वर्मा और उनके बाद दिनकर, अज्ञेय, भवानीप्रसाद मिश्र, मुक्तिबोध, नीरज, तथा रघुबीर सहाय जैसे अनेकानेक रचनाकारों के काव्य सृजन से विकसित होती आ रही है. हिंदी कविता के इस विशाल भंडार के प्रति आज की पीढ़ी कितनी सजग है और उससे कितना ग्रहण कर सकती है इस पर ही हिंदी के भविष्य को आंका जा सकता है. आज आवश्यकता है हम अपनी साहित्यिक धरोहर का सम्मान करें, उसमें से कुछ मोती चुनें और उनकी प्रतिभा से चमत्कृत होकर अपने भीतर सुप्त पड़ी काव्य चेतना को जगाएं.
Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts
Monday, September 14, 2020
Thursday, December 22, 2011
व्यक्ति व समाज
अगस्त २००२
आध्यात्मिकता का एक बड़ा उद्देश्य है लोक संग्रह यानि सेवा, अन्यों के जीवन में हम यदि खुशी का संचार कर सकें, प्रेम व भाईचारे का संदेश दे सकें तो समाज के ऋण से कुछ हद तक तो मुक्त हो सकते हैं. एक व्यक्ति समाज से कितना कुछ लेता है उसका शतांश भी वह लौटा सके तो उसका कितना भला होगा. सब ओर शांति का संदेश फैले, हमारा योगदान भी उसमें हो, ऐसा विचार ही मन-प्राण को ऊर्जा से भर जाता है. मन प्रमादी न ही, छल न करे न खुद से न औरों से, तो वहाँ प्रेम टिकता है और जो हमारे पास ज्यादा हो वही तो हम बाँट सकते हैं. परमात्मा के नाम का उच्चारण इसमें सहायक होता है. वह हमारे साथ है इस का दृढ़ विश्वास हमें हर द्वंद्व से मुक्त करता है.
Subscribe to:
Posts (Atom)