Showing posts with label श्रवण. Show all posts
Showing posts with label श्रवण. Show all posts

Wednesday, September 20, 2023

गुरु बिन ज्ञान कहाँ से पाएँ

गुरु व ज्ञान पर्यायवाची शब्द  हैं, यदि ऐसा कहें अतिशयोक्ति नहीं होगी। गुरु का हर शब्द गहरे चिंतन-मनन के बाद हुए दर्शन से प्रकटता है। वह जीवन की गुत्थियों को पल में हल कर देता है। चीजें उनके आगे अपने गुहतम स्वरूप में प्रकट होती हैं। शास्त्र उनके ही वचनों से बने हैं। वे ईश्वर के प्रतिनिधि हैं। ईश्वर ने हमें सिरजा है, वह इस जगत का आधार है, वह नहीं चाहता कि आनंद स्वरूप बनाने के बाद मानसिक दुख की हल्की सी रेखा भी हमें छू जाये। वह भीतर से हमें प्रेरित करता है और गुरुज्ञान का अधिकारी बनाता है। मानव को जब अपने अंतर में प्रकाश का अनुभव होता है तो उसे जगत ढक न ले, इसकी व्यवस्था गुरु सिखाता है। नियमित साधना, श्रवण तथा मनन का अभ्यास ही समरसता को बनाये रखने में सहायक है। 


Monday, February 5, 2018

श्रावक बन जाता है जो भी

५ फरवरी २०१८ 
साधक के लिए श्रवण का बहुत महत्व है. वेदों को श्रुति भी कहा गया है, जिनमें ऋषियों की वाणी को सुनकर ही संकलित किया गया है. ‘सुनना’ और सही प्रकार से सुनना जिसे आता है, वह सत्य को शीघ्र ही अनुभूत कर सकता है. सामान्य व्यवहार काल में भी यदि हम सामने वाले की बात को सुने बिना ही अपनी राय देने लगते हैं, अथवा ठीक से समझ नहीं पाते तो इसका एक मात्र कारण है श्रवण की कला का न जानना. एक सच्चा श्रावक ही सच्चा साधक बन सकता है. बिना किसी पूर्वाग्रह  और मान्यता के कही गयी बात को सुनने से ही उसके पीछे का सत्य उद्घाटित हो जाता है. सुनते समय यदि मन कहीं  और है अथवा हम अपने ही प्रश्नों में उलझे हैं तो सुनने का भ्रम हो सकता है, वास्तव में हमने सुना ही नहीं. हम संतों की वाणी सुनते हैं, पर हजार बार सुनकर भी हमें अपने भीतर उस सत्य की झलक नहीं मिलती, जिसका जिक्र वे निरंतर करते हैं. सुनने की कला जिसे आ जाती है वह एक न एक दिन उस अव्यक्त को भी सुन लेता है, मौन की गूंज भी उसे सुनाई देती है.