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Tuesday, January 27, 2015

कर्मशील हो पल पल अपना

जनवरी २००८ 
सम्बंध ही वह दर्पण है जिसमें हम अपना वास्तविक रूप देखते हैं. हमारे संबंधों की नींव में यदि मोह नहीं है तो उनमें कभी कटुता नहीं आती. भीतर जब एक क्षण के लिए भी विचलन न हो, सदा समता ही बनी रहे तो मानना चाहिए कि ज्ञान में स्थिति है. वाणी, समय व शक्ति का अपव्यय न हो तो इन हाथों से कितना कार्य हो सकता है. हमारे कर्मों के अनेक साक्षी हैं. सूर्य, चन्द्र, अनल, अनिल, आकाश, भूमि, यमराज, हृदय, रात्रि तथा दिवस, संध्या तथा धर्म ये सभी कर्मों के साक्षी हैं, हमारी आत्मा साक्षी है. परमात्मा रूपी सद्गुरु का हाथ सदा हमारे सिर पर है, हमारे मस्तिष्क पर उसकी पकड़ है, बुद्धि को वही प्रेरणा देता है, वही सद्विचारों से हमें भर देता है. साधना के समय जब मन दूसरी ओर चला जाता है तो वही इसे श्वास पर टिकाने में सहायक होता है.  

Monday, July 22, 2013

तन्द्रा त्याग जागरण मांगें

नवम्बर २००४ 
सामंजस्य की साधना करने के लिए शरीर का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है. शरीर का यदि पूरा ज्ञान हो और शरीर के अंगों पर ध्यान किया जाये तो अपने आप ही सामंजस्य की भावना भीतर आने लगती है. शरीर के विभिन्न अंग मिलजुल कर मस्तिष्क की सहायता से काम करते हैं, उसी प्रकार हम समाज में तथा परिवार में रह सकते हैं, सबसे जरूरी है हमारा अपने साथ सम्बन्ध, हमारे मन का आत्मा के साथ सम्बन्ध, फिर हमारा अपने निकटवर्ती जनों के साथ सम्बन्ध. जब हमारे शरीर की शक्ति का बोध हो जाता है तो प्रमाद, जड़ता तथा आलस्य नहीं रहता, भीतर एक स्फूर्ति का उदय होता है, वह स्फूर्ति हमारे सम्बन्धों में झलक उठती है, तब मन हर क्षण नया-नया सा रहता है, सम्बन्धों में बासीपन नहीं आता, कोई दुराग्रह नहीं रहता, मन तब एक अनोखी स्वतन्त्रता का अनुभव करता है, मन की ऐसी स्थिति कितनी अद्भुत है, कहीं कोई उहापोह नहीं, विरोध नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बिना किसी प्रतिकार, अपेक्षा के द्रष्टा भाव में जीना आ जाता है.

Tuesday, June 5, 2012

मानव ही मिल सकता उससे


अप्रैल २००३ 
हमारा जीवन उसकी कृपा से ही हमारी मुक्ति का साधन बनता है. पहला कदम तो हमने यही उठा लिया जब मानव जन्म मिला, दूसरा उसकी कृपा को अनुभव करना है. कृपा मिली तो तीसरा कदम है उसको जाने की इच्छा का होना, उस एक इच्छा ने अन्य सभी छोटी कामनाओं को अपने में समेट लिया क्यों कि उस एक को पाने से सब कुछ अपने आप मिल जाता है. उस एक को पाने के लिये जब हम एक कदम बढाते हैं तो वह हजार कदमों से हमारी ओर बढ़ता है. वह कैसे हरेक के हृदय में रहकर उसे निर्देशित करता है यह तो वही जाने पर वह करता जरूर है, उसे पुकारो तो वह तत्क्षण हाजिर होता है और अपने को जनाता भी है. उससे आध्यात्मिक सम्बन्ध बनाना है, देह बुद्धि से स्वयं को मुक्त करके आत्म बुद्धि की ओर ले जाना है.