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Saturday, July 13, 2013

नानक दुखिया सब संसार


दुःख मांजता है, हमारे जीवन में यदि दुःख न आये तो हम कभी सचेत ही न हों, हमें जगाने के लिए ही दुःख आते हैं. जीवन एक ही सुर में बहता रहे ऐसा तो सम्भव नहीं. हम जब स्थायित्व चाहते हैं तभी दुःख का अनुभव करते हैं. यदि दुखद घटना को भी प्रकृति का परिवर्तन मानकर चलें तो दुःख हम पर हावी नहीं हो पायेगा. यह जगत वास्तव में दुखरूप तभी तक है जब तक हम इससे बंधे हैं, मैं, मेरा की रस्सियों से खींचे जाते हैं. ध्यान की गहरी अवस्था में जाकर हम देखते हैं की मन का स्वभाव है प्रतिक्रिया करना, यदि सुखद अथवा दुखद घटना होने पर मन प्रतिक्रिया करना छोड़ दे तो हमें उसका अनुभव नहीं होता. मन को समता में रखना ही अध्यात्म है. जैसे बालक को कोई चिंता नहीं होती, वह हर परिस्थिति में आनन्द में होता है, उसका हंसना व रोना पल भर का ही होता है, हम दुःख के पलों को उस समय का जीवन मानकर जियें तो वे हमारे भीतर की शक्ति के सम्मुख छोटे हो जायेंगे. परमात्मा की शक्ति के आगे ये दुःख बौने हैं., और वह अपार शक्ति हममें से हरेक के भीतर छुपी है. जीवन को जैसा वह सम्मुख आये स्वीकार करने से ही हम ज्ञान के सच्चे अधिकारी बन सकते हैं.