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Saturday, June 28, 2014

सत्य वही जो मुक्त करे

दिसम्बर २००६ 
ज्ञान हमें मुक्त कर देता है, भीतर से मुक्तता अनुभव में आते ही सारा जगत एक अनोखे प्रकाश से भर गया प्रतीत होता है. आत्मज्ञान पाकर ही मानव वास्तव में स्वयं को पहचानता है. उसके पूर्व तो वह अपनी क्षमता से कहीं निम्न स्तर पर जीता है. एक दासता का जीवन, मन की दासता, इन्द्रियों की दासता, धन, यश, मोह, क्रोध, और अहंकार की दासता, इनके अलावा मन की और कई सुप्त प्रवृत्तियों की दासता वह सहता है. किन्तु जब सत्य का बोध होता है मात्र उसकी झलक भर मिलती है तो जैसे कोई पर्दा उठ जाता है. वह स्वयं को कितना हल्का महसूस करता है. अनंत आकाश में निर्विरोध उसका गमन होता है.


Tuesday, May 20, 2014

बनें साक्षी निज मन के ही

मार्च २००६ 
मन का यह विचित्र स्वभाव है कि जिस कांटे से बिंधता है बार-बार उसी के पास जाना चाहता है, जैसे किसी के दांत में दर्द हो तो जिह्वा बार-बार उसी जगह जाती है, पर मन को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाये उतना ही अच्छा है कि वह अपनी प्रकृति का शिकार स्वयं ही होता है, संस्कार गहरे करता जाता है और जाल में फंसता जाता है. हम जितना-जितना प्रतिक्रिया करेंगे, गुण-दोष की परवाह करेंगे, निर्णायक बनेंगे, उतना-उतना ही हमारे कर्म संस्कार गहरे होते जायेंगे, जितना-जितना साक्षी भाव में रहेंगे, उतना ही मुक्तता का अनुभव करेंगे. जो अपने स्वभाव में स्थित ‘होना’ सीख जाता है, जगत उसे प्रभावित नहीं कर पाता. उसे कुछ करके या पाके स्वयं को सिद्ध नहीं करना वह सहज ही संतुष्ट है और निर्लिप्त होकर जगत के खेल देखता है.