Showing posts with label मुखौटा. Show all posts
Showing posts with label मुखौटा. Show all posts

Saturday, August 4, 2012

जीवन सरल बनाता ध्यान

जून २००३ 
हमारा मन अपने लक्ष्य से एक क्षण के लिये भी न भटके, जो लक्ष्य हमने तय किया है वह सारे कार्यों से प्राप्त होता है. ध्यान के एक घंटे के लिये शेष तेईस घंटे उसके विपरीत नहीं हों तभी ध्यान सधता है. मन, वचन, कार्य में एक रूपता होगी , तभी जीवन में वह झलकेगा जिसकी हम कामना करते हैं. ईश्वर कण-कण में है उसे देखने की आँख हमें भीतर विकसित करनी है. तब उसके मौन में भी ऐसा असर होगा, जो भीतर तक शीतलता भर दे. उसका नाम भी एक बार प्रेम से पुकारो तो मन ठहर जाता है. जीवन तब बहुत सरल लगता है, सहज रूप से हम जी पाते हैं, वरना तो मुखौटों से पीछा नहीं छूटता, पर उसके सामने कोई मुखौटा नहीं चलता. हम अपने वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट देख पाते है, उसमें स्थित हो पाते हैं और प्रेम को उसके शुद्धतम रूप में अनुभव कर पाते हैं.