Showing posts with label बन्धु. Show all posts
Showing posts with label बन्धु. Show all posts

Friday, May 9, 2014

आ लौट के आजा मेरे मन

फरवरी २००६ 
आत्मा की सुगंध में जीना मानो प्रभु के आगे पुष्प भेंट करना है, अपनी आत्मा में रहकर व्यवहार करना ही उसकी सच्ची आराधना है. हमारा मन ‘सैलानी’ मन तो नहीं है, इसका ध्यान रखना होगा. अपने से अभिन्न परमात्मा जो अभी दूर लगता है, दूर है नहीं. हमारे भीतर वही बन्धु रूप में सदा चिदाकाश स्वरूप ही रहता है. कर्मों के बंधन से हमें मुक्त होना है. उसकी उपस्थिति का अनुभव होते ही संचित कर्म नहीं रहते, नये हम बांधते नहीं. भक्ति हमें मुक्ति प्रदान करती है और अहंकार से मुक्ति, भक्ति में लगाती है.