Wednesday, November 4, 2020

मुक्ति की जो करे साधना

 

सद्गुरु कहते हैं शिव हुए बिना कोई शिव की पूजा नहीं कर सकता ! शिव देह भाव से मुक्त हुई उस चेतना का नाम है जो परम प्रेमस्वरूप है। वह मुक्त है, निर्दोष है. उसमें एक भोलापन भी है। वह ज्ञान स्वरूप है पर उसे अपने ज्ञानी होने का अभिमान नहीं है। शिव का प्रतीक हमारी आत्मा का प्रतीक है। वह कितना सुकोमल और सुडौल है, उसमें कहीं कोई कोना उभरा  हुआ नहीं है, नुकीला नहीं है। वह किसी को हानि नहीं पहुँचाता। उस पर जल चढ़ाने का अर्थ है मन को निर्मल करना, फूल अर्पित करने का अर्थ है सारी कटुता को भीतर ही समा लेना उसे बाहर न आने देना। धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपने अवगुणों को समर्पित कर देना। बेल पत्र अर्थात तीनों गुणों – सत, रज, तम के पार चले जाने की साधना करना। शिव तत्व और गुरू तत्व एक ही हैं ऐसा भी शास्त्र कहते हैं।

4 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 5 नवंबर 2020 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सत्यम शिव सुंदरम .... भाव सुंदर

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