Tuesday, April 9, 2013

एक ही सत्ता रूप बदलती


जुलाई २००४ 
हमारे भीतर जो चेतना है, वह परम है, पवित्रतम है, जो हमारे माध्यम से काम कर रही है. यह देह, मन, बुद्धि सब उसी के उपकरण हैं, वह इनके माध्यम से स्वयं को प्रकट कर रही है. जब “मैं हूँ” यह भाव नष्ट हो कर ‘वह है’, ‘तुम हो’ यह भाव प्रमुख होता है तब धीरे-धीरे सब कुछ एक समष्टि में बदल जाता है. सभी कुछ उस एक का ही प्रतिबिम्ब है यह भाव दृढ़ हो जाता है. जब ऐसा हो जाये तब अपना कुछ नहीं रह जाता और अपना सभी कुछ है. तब कुछ भी नहीं करना और सभी कुछ करना है, सारे कृत्य अपने ही लगते हैं और फिर भी कर्ता भाव नहीं रहता, सभी अपने हैं पर ममता भाव नहीं, मैं ही वह हूँ पर अहंता भाव नहीं....और ऐसा तभी होता है जब अनवरत बरसती कृपा के प्रति कोई सचेत होता है. 

Sunday, April 7, 2013

परम स्वतंत्रता है मानव को



  हजारों वर्ष पहले मानव यह जान चुका था कि ईश्वर उसके ही हृदय में निवास करते हैं, वही  सर्वोच्च शक्ति का वाहक है, वही परमात्मा का अंश है, जो परमात्मा का परिचय दे सकता है, वही है  जो अनंत प्रेम बाँट सकता है, वही है जिसके लिए परमात्मा ने इस सुंदर सृष्टि का निर्माण किया है, उसी के पास बुद्धि रूपी अस्त्र है, ज्ञान रूपी अग्नि है. उसमें देवत्व की सारी सम्भावनाएं मौजूद हैं, पर उसको परम स्वतंतत्रा भी है कि वह इन सबका उपयोग ऊपर उठने के लिए करे या नीचे गिरने के लिए. क्योंकि उसमें दानव बनने की भी समस्त सम्भावनाएं हैं, वह स्वयं को दुखी भी बना सकता है और चाहे तो परमपद भी पा सकता है, जहाँ शांति की अजस्र धारा बहती है. 

Friday, April 5, 2013

खो गयी है चाबी कोई


जुलाई २००४ 
हमारी अनुभूतियाँ जितनी सच्ची होंगी, उतना हमारा मन खाली होता जायेगा, हमारा मन जितना खाली होगा उतना प्रेम उसमें समाता जायेगा. हम कटुता से तभी भरते हैं जब भीतर की अनुभूति को छू नहीं पाते, एक पर्दा सेवार का मन की झील पर छा जाता है. हमें सरल होना है, कोई दुराव या छिपाव नहीं क्योंकि हमारे भीतर कोई है जो सब देखता है, सब जानता है, वह हमारे पक्ष में है, सुह्रद है, हितैषी है, वह हमें प्रगति के पथ पर देखना चाहता है, मन की झील जब स्वच्छ होगी पारदर्शी होगी तभी हम भीतर की उस गरिमा को देख पाएंगे. हमारा जीवन तब एक मधुर गीत की तरह विश्व में गूंज उठेगा, उन्मुक्त पंछी की तरह गा उठेगा. जंगल के नीरव एकांत में बहते झरने का संगीत भीतर से सुनाई देगा. हम जो ऊर्जा के अनंत स्रोत हैं, पर स्वयं की कीमत नहीं जानते, परमात्मा तब हमारे माध्यम से स्वयं को प्रकट करेगा. हम जिसके पास एक खजाना है और जन्मों से इस खजाने की चाबी को खोजे बिना ही चले गए हैं, इस बार उस खजाने को पाकर यहीं लुटा देना है. 

Thursday, April 4, 2013

घर खाली देख चला आता


जुलाई २००४ 
ज्ञान और दुःख एक-दूसरे के विरोधी हैं, जहाँ ज्ञान है वहाँ दुःख नहीं टिक सकता और जहाँ दुःख है वहाँ भीतर का अज्ञान ही प्रकट हो रहा है. वास्तविक ज्ञान वही है जो सदा के लिए समस्त दुखों से छुटकारा दिला दे. संत उसी ज्ञान को देना चाहते हैं, वह जगत में रहते हुए भी उससे ऊपर हैं, सुखद-दुःखद परिस्थितियाँ तो आती-जाती रहेंगी, पर दुखी होना अथवा न होना हमारी मानसिक परिपक्वता पर निर्भर करता है. सुख की दौड़ खत्म होते ही दुःख अपने आप मिटता जायेगा. जीवन जैसा मिला है उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकारना सीखना होगा. हम जीवन को अपनी रूचि के अनुसार चलाना चाहते हैं, तभी दुःख के भागी होते हैं. हर क्षण को वैसा ही स्वीकार करने से मन में द्वंद्व नहीं रहता, मन खाली हो जाता है, खाली मन में ही ईश्वर की महिमा प्रकट होती है.

सहज हुए से सुख आता है



यदि कोई किसी भौतिक वस्तु, परिस्थिति या व्यक्ति से ही सुख प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो दुःख का भागी भी उसे होना ही पड़ेगा. सुख के पीछे भागो तो नियम के अनुसार दुःख पीछे-पीछे आता ही है, इसी तरह यदि सुख का केन्द्र ज्ञान है तो आनंद पीछे-पीछे आयेगा. इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले भोग अक्सर रोग के कारण बनते हैं और ज्ञान से प्राप्त होने वाला आनंद योग कराता है. ईश्वर ने हमें बुद्धि प्रदान की है जो ज्ञान की आकांक्षी है, जो भीतर के रस से ही तृप्त हो सकती है, उस रस से, जिसका स्रोत प्रेम है. जीवन में प्रेम नहीं है तो आनंद निज की वस्तु बनकर रह जायेगा, उसका व्यवहारिक रूप प्रेम है. भीतर के आनंद का बाहर प्राकट्य हमारे कर्मों से होगा, अन्यथा बादलों में बिजली की चमक की तरह उसका आना होगा. जो चिर स्थायी है, ऐसी तेल धारवत् शांति जब हृदय में छायी रहे वही आनंद है.

Tuesday, April 2, 2013

मन देखे मन खाली होता


जून २००४ 
चिदाकाश में आत्मा तथा परमात्मा साथ-साथ हैं पर दोनों के बीच मन का पर्दा है, जैसे-जैसे मन खाली होता है, वैसे वैसे वे प्रकट होने लगते हैं. उनकी निकटता का अहसास होता है, जब तक पूर्णता का अनुभव नहीं होता मन बना ही रहता है, पर कृपा सदा हम पर बनी रहती है. पूर्णता मानव के भीतर बीज रूप में विद्यमान रहती है, पर मन के संकल्प-विकल्प उसे प्रस्फुटित होने से रोकते हैं. संत जन अपने विशाल हृदय में अनंत प्रेम, ज्ञान और आनंद समेटे हैं, उनके दर्शन से हमारे भीतर भी गाँठें खुलने लगती हैं, वह हमारे दर्पण बन जाते हैं, हमें मन को देखने की कला आ जाती है.

पूर्णमदः पूर्णमिदं



पांच तत्वों से मिलकर हमारा तन बना है और तीन तत्वों से मन, वे हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश. जब हम सृजनशील होते हैं, पोषण करते हैं अथवा परिवर्तन करते हैं तो ये तीनों तत्व क्रियाशील होते हैं. सभी के भीतर किसी न किसी अंश में ये तीनों होते हैं, लेकिन जब हमारे कर्म स्वार्थ की पूर्ति के लिए न होकर सहज हों अथवा तो आनंद के फलस्वरूप हों तो वे तीनों से पार चले जाते हैं, यही तीनों सत्व, रज, तम गुण के भी परिचायक हैं, हमें गुणातीत होना है. आत्मा से आत्मा में संतुष्ट रहना तभी सम्भव है. बाहर का सुख मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं, भीतर का सुख निरपेक्ष है, अनंत है, अपरिमेय है, इसका आश्रय लेकर जब हम जगत में व्यवहार करते हैं तो वह पूर्ण होता है, प्रामाणिक होता है. पूर्ण की उपासना ही हमें पूर्ण बनाती है.