Thursday, June 6, 2019

निकट आ गया जो स्वयं के ही



दिन-रात, सुबह-शाम, सर्दी-गर्मी सभी कुछ तो अपने आप हो रहे हैं. जन्म-मृत्यु, स्वास्थ्य-रोग, सुख-दुःख, यश-अपयश भी अपने आप आते-जाते हैं. मानव की भूमिका इसमें कहाँ आरम्भ होती है ? कितना अच्छा हो कि पूर्वजों की सीख के अनुसार वह दिन में पूरी निष्ठा से कार्य करे और रात्रि को विश्राम करे. सुबह-शाम दोनों समय संध्या करे अर्थात कुछ देर शांत होकर बैठे और अस्तित्त्व के साथ अपनेपन को अनुभव करे. सर्दी में सर्दियों का आहार-विहार अपनाये और गर्मियों में उस ऋतु के अनुसार स्वयं को ढाले. जन्म-मृत्यु दोनों का स्वागत करे, स्वास्थ्य-रोग दोनों में पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखे. सुख-दुःख में मन को समता में रखे. यश-अपयश को साक्षी भाव से सहन करे. आज विश्राम खो गया है, संध्या खो गयी है, ऋतुु के अनूरूप आहार-विहार खो गया है और भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक भी नहीं रहा. जन्म को रोका जा रहा है, मृत्यु को दूर खिसकाया जा रहा है. नकली मुस्कान को सुख का पर्यायवाची मान लिया गया है और दुःख से सीखने की बजाय किसी न किसी तरह उसे भुलाने का प्रयत्न चलता है. स्वयं ही स्वयं का यशगान होता है और जरा सी उपेक्षा आहत कर देती है. मानव जैसे अस्तित्त्व से दूर हो गया है. जरूरत है एक बार फिर अपने भीतर लौटने की, और सब कुछ बदल जाता है.

Tuesday, June 4, 2019

स्वच्छ रहे परिवेश हमारा



पर्यावरण संरक्षण से तात्पर्य है जो आवरण हमें हमारे चारों ओर से घेरे हुए है, उसका बचाव. कोई सोचता है कि हवा, पानी और जल जो हमसे बाहर हैं उनका बचाव. किंतु इस आवरण का आरंभ हमारी देह की सीमा आरंभ होते ही हो जाता है, यानि भीतर से ही. हमारा शरीर साठ प्रतिशत जल तत्व से बना है, अशुद्ध जल भीतर जाते ही भीतर का जलीय वातावरण बिगड़ जाता है. देह के कण-कण में वायु तत्व है, जो श्वास हम ग्रहण करते हैं यदि वह अशुद्ध है तो भीतर स्वच्छता की कामना रखना व्यर्थ है. इसी तरह पृथ्वी यानि भोजन का जो अंश हम रोज ग्रहण करते हैं यदि रासानियक रूप से प्रदूषित है तो देह के अंग स्वस्थ नहीं रह सकते. मन बनता है भोजन के सूक्ष्म अंश से, प्राण बनता है वायु के सूक्ष्म अंश से, यदि मन व प्राण ही साफ-सुथरे नहीं हैं तो रोग को हम स्वयं ही आमन्त्रण दे रहे हैं. इसका अर्थ हुआ पेड़ लगाना, नदियों को स्वच्छ रखना, रसायन मुक्त खेती करना, आज यह विश्व के लिए या देश के लिए जरूरी नहीं है बल्कि हमारे खुद के अस्तित्त्व की रक्षा के लिए आवश्यक हो गया है. जीवन का सम्मान यदि हमें करना है तो अपने परिवेश की स्वच्छता के प्रति सजग होना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.

Sunday, June 2, 2019

योग की महिमा कौन बखाने



जून का महीना आते ही 'योग दिवस' की याद आ जाती है. 'इक्कीस जून' को ही 'योग दिवस' के रूप में क्यों चुना गया होगा, सम्भवतः इसलिए कि इस दिन भोर जल्दी होती है और शाम देर से होती है, वर्ष का सबसे दीर्घ दिन है इक्कीस जून. योग भी हमारे जीवन को कई तरह से दीर्घ बनाता है. योग एक जीवन पद्धति है जो शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक, और आध्यात्मिक रूप से मानव जीवन को समृद्ध करती है. योग का एक अर्थ है जोड़ना, इसका साधक पहले खुद से जुड़ता है, फिर समष्टि से. आसन करने से देह व श्वास जुड़ते हैं, प्राणायाम करने से देह, श्वास व मन जुड़ते हैं, ध्यान से देह, श्वास, मन, बुद्धि तथा चेतना जुड़ते हैं. योग का एक अर्थ समाधि भी है, जिसमें टिकने से साधक पूरे अस्तित्त्व से जुड़ जाता है, उसके लिए कोई पराया नहीं रहता. यदि कोई समाधि तक न भी पहुँचे तब भी स्वयं से जुड़ना एक असीम आनंद की उपलब्धि कराता है. निय्मिओत और सही ढंग से योग करने वाला व्यक्ति सहज ही प्रसन्न रहना सीख जाता है, उसके जीवन में अनुशासन आ जाता है. एक साथ योग करने से समूह भावना का जागरण होता है. शरीर बिना दवाओं के स्वस्थ रहता है. मन बिना मनोरंजन के शांत रहता है. बुद्धि तीव्र होती है और स्वतः ही उसकी दिनचर्या सात्विक होने लगती है. आज की भौतिकतावादी जीवन शैली के कितने दुष्प्रभाव हमें देखने को मिल रहे हैं, इस सबसे यदि आने वाली पीढ़ी को दूर रखना है तो उन्हें बचपन से ही योग सिखाना होगा.

Saturday, June 1, 2019

चाहें तो इस पल में जी लें



वर्तमान के लघु क्षण में विराट छिपा है, जिसने ध्यान के इस राज को जान लिया, वह मुक्त है. मन सदा अतीत में ले जाता है या भविष्य की कल्पना में. वर्तमान में आते ही मन मिट जाता है, उसे टिकने के लिए कोई न कोई आधार चाहिए. वर्तमान का पल इतना छोटा है कि उसमें कोई शब्द नहीं ठहर सकता. मन शब्द के सहारे ही जीवित रहता है. मौन का अनुभव वर्तमान का अनुभव है. अतीत में जाकर कभी मौन को अनुभव नहीं किया जा सकता. मौन ही सत्य का अनुभव है. यदि कोई इस क्षण में टिकना सीख ले तो वह ऊर्जा के परम स्रोत से जुड़ जाता है. ऊर्जा का यह स्रोत प्रेम, आनंद और शांति का संगम है.

Thursday, May 30, 2019

मन को जिसने जान लिया है



मन पानी की तरह है, तरल ! और यह सदा प्रवाह में रहता है. चैतन्य अचल है पर उसकी ही शक्ति मन एक पल भी स्थिर नहीं रहता. चैतन्य स्वयं में संतुष्ट है पर मन सदा किसी न किसी तलाश में रहता है. जगत में विज्ञान का जो इतना विस्तार हुआ है वह मन के इसी खोजी स्वभाव का ही परिणाम है. मन यदि अपने इस स्वभाव से परिचित हो जाये तो अपने बदलाव को सहजता से स्वीकार कर लेगा. एक तरंग की तरह जो उसमें चढ़ाव व उतराव आते हैं, कभी वह सुख का अनुभव करता है कभी उदासी का, तो इस बदलाव को वह एक आश्चर्य की तरह देखेगा, इसका उपयोग करेगा  और आगे बढ़ जायेगा. मन गतिशील है एक नदी की धारा की तरह, कभी उथला है जल और कभी गहरी है नदी, कभी फूलों के हार उसमें बहते हैं, कभी सड़े हुए पत्तों को लिए कोई सूखी डाल. मन को जिस स्थान से देखा जा सकता है वहीं विश्राम है. जीवन में गति और विश्राम दोनों ही चाहिए. 

Tuesday, May 28, 2019

पल पल सजग रहे जब मन



हम अपने सुख के लिए जितना-जितना बाहरी वस्तुओं का आश्रय लेते हैं, मन की संवेदनशीलता उसी अनुपात में घटती जाती है. देह को बनाये रखने के लिए जितना आवश्यक है और जो लाभदायक है वैसा ही और उतना ही आहार यदि हम लेते हैं तो मन सजग है. इसी प्रकार वस्त्र और अन्य इस्तेमाल में आने वाली वस्तुएं यदि दिखावे के लिए होती हैं तो मन असजग ही कहा जायेगा. आजकल ध्यान के प्रति लोगों की रूचि बढ़ रही है, किंतु यदि मन सोया हुआ है तो उसे ध्यान की झलक मिलेगी कैसे. सजगता ही तो ध्यान है. यदि कोई मन को बहलाने के लिए मनोरंजन का ही आश्रय ले लेता है तो वह भीतर के वास्तविक सुख को पाने का प्रयास ही क्यों करेगा. संसार के सारे सुख मन के आगे रखे गये खिलौने ही तो हैं. साधक उनकी व्यर्थता को जान लेता है और और तब ध्यान की यात्रा आरम्भ होती है. मन जब ठहर जाये तो शुद्ध चैतन्य की पहली झलक मिलती है. पुनः पुनः इसे दोहराने पर यह भीतर की सहज अवस्था बन जाती है. साधक तब मन से उसी तरह काम ले सकता है जैसे कोई आँख आदि से काम लेता है, अर्थात जब जो सोचना चाहे उतनी देर उस विषय पर सोचे, यह क्षमता तब विकसित होती है.

हम उस देश के वासी हैं



चुनाव आये, हफ्तों तक चले और अब परिणाम भी आ गया. देशवासियों ने मिलकर एक निर्णय लिया और एक मजबूत सरकार को चुना. आज हर भारतीय एक नये भरोसे और विश्वास के साथ भविष्य की ओर बढ़ रहा है. प्रधानमन्त्री ने कहा है पारदर्शिता और परिश्रम के बिना विकास का मार्ग तय नहीं किया जा सकता. हर व्यक्ति सुख चाहता है, सुख का आधार है हमारी पारमार्थिक जीवनशैली. जिसमें प्रकृति का सम्मान हो और अपने बुजुर्गों का आदर हो. जिसमें हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति हमारे श्रम से होती हो, न कि किसी अनुदान से. स्वच्छता की जिम्मेदारी हर कोई निभाए और सामाजिक बुराइयों को दूर करने का बीड़ा भी सब मिलकर लें. देश हम सबका है और इसको समृद्धि की और ले जाना हमारे ही हाथ में है. यदि हम सरकार की नीतियों को जमीन पर उतरते हुए देखना चाहते हैं तो हमें भी अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करके सहयोग करना होगा.