Friday, September 23, 2011

सच्चिदानन्द और हमारा मन


मार्च २००२ 

कृष्ण हमारे अंतरंग हैं, वह हमारे मन के उस कोने तक भी पहुंचे हुए हैं जहां हम स्वयं भी नहीं गए हैं. उनसे हमारा सम्बन्ध आदिकाल से है, सदा से है, नित्य है और जो भी सुख हम इस जग में होने वाले सम्बन्धों से पाते हैं वह मात्र उसका प्रतिबिम्ब है. हम प्रतिबिम्बों से कब तक मन बहला सकते हैं, हमारे सारे जप-तप नियम का उद्देश्य है मन की शुद्धि, ताकि हम उस सच्चिदानंद के दर्शन कर सकें, मन चेतन है सत है और आनंद स्वरूप है लेकिन हम मन के इस रूप को नहीं जानते जैसे कोई किसी महापुरुष के सम्पर्क में हो पर उसके गुणों से अनभिज्ञ हो तो उसे कोई अनुभूति नहीं होगी. परम सत्य को न जानने के कारण ही हम उससे दूर रहते हैं, जबकि वह हमें इसकी जानकारी देना चाहता है.

Thursday, September 22, 2011

गुणातीत


मार्च २००१ 

मानव अपनी प्रकृति का दास होता है. कृष्ण ने सच ही कहा है कि गुण ही गुणों को वर्तते हैं. हम अपनी प्रकृति के अनुसार कर्मों को करते हैं फिर कर्म बंधन में पड़ जाते हैं. यही कर्म हमारे अगले जन्म का कारण बनते हैं और यह क्रम चलता रहता है. कभी तो इस पर रोक लगानी होगी, गुणातीत होना होगा. ईश्वर की शरणागति के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं. वही हमें अभय प्रदान करते हैं. पूतना, अघासुर, बकासुर, तृणासुर, शकटासुर और नरकासुर के रूप में स्थित काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर का वह खेल-खेल में नाश कर देते हैं. कितनी अद्भुत है कृष्णलीला !

Wednesday, September 21, 2011

आत्म ज्ञान


मार्च २००१ 

ईश्वर को हम याद तो करते हैं पर अपने सुख की कामना के लिए, हम यह चाहते हैं कि ईश्वर हमारे जीवन को कष्टों से मुक्त रखे. हम ईश्वर को चाहते ही कहाँ हैं ? हम तो सुख-सुविधाओं के आ कांक्षी हैं फिर यदि वह हमसे दूर है तो इसमें क्या आश्चर्य है. लेकिन ईश्वर इतने दयालु हैं कि वे हमारा साथ नहीं छोड़ते, आत्मा के साथ वे हमारे हृदय में रहते हैं. आत्मा अपने को उनमें देखने के बजाय मन, बुद्धि व अहंकार में देखती है, और सुख –दुःख का अनुभव करती है. उसे स्वयं का ज्ञान हो जाने पर मन शांत हो जाता है, बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है, अहंकार विगलित हो जाता है तब आत्मा अपने मूल स्वरूप यानि परमात्मा में स्थित हो जाती है. यह जगत भी तब उसी तरह स्वप्नवत् प्रतीत होता है जैसे स्वप्न का जगत है. जो आंख खुलते ही नष्ट हो जाता है. तब हम इस जगत में रहते हुए भी इसमें लिप्त नहीं होते. स्वयं को कर्ता व भोक्ता नहीं मानते, प्रकृति अपने गुणों के अनुसार कर्म करवाती है और परमात्मा ही परम भोक्ता है, यह ज्ञान हमें मुक्त करता है. 

Tuesday, September 20, 2011

माया और मायापति


कृष्ण आदि देव हैं, जगत के आधार हैं. चैतन्य के ऊपर ही जड़ टिका है. यहाँ सब कुछ प्रकृति के गुणों के अनुसार ही हो रहा है जो उनकी अध्यक्षता में काम करती है. तब इस दुनिया में भय करने का कोई कारण नहीं रह जाता. चिंता अथवा दुःख का भी कोई वाजिब कारण नहीं है. यह तो उसका ही खेल है उसकी माया है. हमें उसकी  माया से मोहित होने की क्या आवश्यकता है. वह स्वयं हमें भीतर से इस माया से मुक्त होने के लिए प्रेरित करता है. इस खेल के नियम भी तो उसके ही बनाये हुए हैं. कृष्ण को अपने जीवन का केन्द्र बना लें तो जीवन के सारे शून्यों को अर्थ मिल जाता है. परमात्मा से प्रेम करना उतना ही सहज है, जैसे पंछियों का गगन में उड़ना, बूंद का सागर में मिलना. हमें सहज होकर इस संसार में रहना है तब जीवन एक उपहार बन जाता है और मृत्यु एक वरदान.

Monday, September 19, 2011

अंश और अंशी


फरवरी २००१ 

जो जिसका अंश है वह उससे दूर नहीं रह सकता, जैसे धरती से उत्पन्न वस्तुएं धरती की ओर आकर्षित होती हैं, वैसे ही हम उस चैतन्य के अंश होने के कारण उसी की ओर खिंचते हैं. उस तक पहुंचने के लिए हमें कोई प्रयास भी नहीं करना है, यह उतना ही सहज है जितना ऊपर से गिरायी वस्तु का नीचे आना. बल्कि उससे दूर जाने के लिए हमें अथक प्रयास करना पड़ता है. लेकिन संसार ऐसे ही चलता है विपरीत दिशा में. जो सहज है, सरल है उसे भाता नहीं. वह सदा अपने अहंकार की पुष्टि के लिए कठिन मार्ग को ही अपनाता है. एक दृष्टि से देखा जाये तो संसारी ज्यादा तप करता है भक्त से भी और ज्ञानी से भी.   

Friday, September 16, 2011

तीन अवस्थाएं


जनवरी २००२ 

हम तीन स्तरों पर जीते हैं, एक भौतिक स्तर यानि देह के स्तर पर, दूसरा मानसिक स्तर तीसरा आत्मिक स्तर जहां देह व मन की कोई पहुंच नहीं है. इन तीन स्तरों की तुलना पदार्थ की तीन अवस्थाओं से की जा सकती है- ठोस, द्रव व गैसीय अवस्था. ठोस शरीर है जहां अन्यों से हमें अपनी भिन्नता का भास होता है. यहाँ हमें दुःख का अनुभव अधिक होता है. मन तरल है जिस तरह दो द्रव आपस में मिल सकते हैं वैसे ही सूक्ष्म होने से मन भी मिल सकते हैं, भिन्नता कम हो जाती है. यहाँ सुख की अनुभूति अधिक होती है. तीसरी है आत्मा जो सूक्ष्मतम होने से वाष्प की तरह सब जगह व्याप्त है. आत्मा के स्तर पर कोई भेद नहीं रह जाता. यहाँ न सुख है न दुःख, आत्मा दोनों से परे  है. 

Thursday, September 15, 2011

कामना और सुख


जनवरी २००२ 

कोई कामना जब हमारे हृदय में उठती है तो वहाँ रिक्त स्थान बन जाता है, वह हमें चैन से बैठने नहीं देता किसी न किसी तरह उसकी पूर्ति हम करना चाहते हैं. पर यह जरूरी तो नहीं कि वह रिक्तता भर ही जाये, अर्थात हमारी हर कामना पूरी हो ही जाये. उसकी पूर्ति के रूप में सुख ही तो  हम बाहर से लेना चाहते हैं, यदि अपने अंतर के सुख के स्रोत का पता चल जाये तो सुख भीतर से बाहर देने की कला आ जायेगी और भीतर की रिक्तता भी स्वयंमेव भरती चली जायेगी.