Tuesday, October 4, 2011

दिव्यता


मई २००२

मन को नींद से जगाना है, शोध करते-करते ही बोध होता है. मन की गांठ जब तक नहीं खुलेगी तब तक अज्ञान नहीं मिटता और अज्ञान मिटे बिना ईश्वर का अनुभव भी नहीं होता. राग, द्वेष, अहंता, ममता आदि जीव की सृष्टि में हैं ईश्वर की सृष्टि में नहीं. अपनी प्रकृति तथा स्वभाव के अनुसार हम प्रेरित हो रहे हैं और सुख-दुःख का अनुभव कर रहे हैं. अपने तुच्छ स्वभाव को दिव्य स्वभाव में बदलना ही साधना है, और यही जागरण है, जिसके बाद ही हम मानव होने की गरिमा को प्राप्त होते हैं. 

Monday, October 3, 2011

आनंद

मई २००२ 
जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता है एक निर्दोष आनंद, एक ऐसी मुस्कान जो कोई हमसे छीन न सके. किसी को मुझसे भय न हो और किसी से मुझको भय न हो यह बहुत बड़ा गुण है. जितना-जितना हम स्वयं को व्यर्थ के संकल्पों से खाली करते जायेंगे वह आनंद जो भीतर ही है, कहीं से लाना नहीं है, भरता जायेगा, वह मुस्कान भी हमारी आत्मा प्रतिपल लुटाए जा रही है पर मन का आवरण उसे प्रकट होने नहीं देता. मन में श्रद्धा हो तो धीरे धीरे वह समाहित होने लगता है और आवरण क्षीण होने लगते हैं.

Saturday, October 1, 2011

मृण्मय और चिन्मय


अप्रैल २००२ 
हमारे विचारों का केन्द्र चिन्मय है अथवा मृण्मय, इस पर ही सब निर्भर करता है. हमारा मन, बुद्धि देह सभी मृण्मय हैं पर इनका प्रयोग हमें चिन्मय को जानने के लिए करना है. ऐसा कब होगा, कैसे होगा यह तो समय ही जानता है पर हमारी जीवन यात्रा यदि उस ओर हो तो आनंद हमारा सहचर बन जाता है. जैसे जल में प्रवेश करते ही उसकी शीतलता का अनुभव होता है, चिन्मय जो सत् चित् आनंद स्वरूप है उसका चिंतन करते ही उसकी हवा हमें छूने लगती है. पहले उसे स्थूल रूप में देखना है फिर सूक्ष्म भी अनुभव में आयेगा. प्रकृति में उसी का रूप छिपा है. जैसे मोती धागे में पिरोये होते हैं सारा जगत उसी में पिरोया हुआ है.

Friday, September 30, 2011

ध्यान क्या है


अप्रैल २००२ 

यदि मन एक ही अवस्था में टिक जाता है यही ध्यान है. यदि हम मन को प्रयास करके नहीं ठहरा रहे हैं, यह स्वतः विश्राम में है, निर्विकल्प बोध ही शेष है, यही ध्यान है और यदि कुछ देर तक मात्र बोध ही शेष रहे कोई संदेह भीतर न हो, और तब भीतर एक सहजता का जन्म होता है जिसे कोई ले नहीं सकता, यही ध्यान है.

Thursday, September 29, 2011

आनंद का स्रोत


मार्च २००२ 
ईश्वर के प्रति या कहें शुभ के प्रति, सत्य के प्रति या ज्ञान के प्रति जिस हृदय में प्रेम नहीं है वह शुष्क मरुस्थल के समान है जहां झाड़-झ्न्काड़ के सिवाय कुछ नहीं उगता, जहां मीठे जल के स्रोत नहीं हैं. जहां तपती हुई बालू है जिसपर दो कदम चलना भी कठिन है. जो मरुथल स्वयं को भी तपाता है और अन्यों को भी. जिस हृदय में भगवद् प्रेम है वह अपने भीतर स्थित उस आनन्द के स्रोत से जुड जाता है जो है तो सब के भीतर पर अनछूया ही रह जाता है.

Tuesday, September 27, 2011

श्रद्धा और मन


मार्च २००२ 

हम अपना कीमती सामान सम्भाल कर रखते हैं, पर अपने इकलौते मन को इधर-उधर रखने में नहीं हिचकिचाते. मन की तिजोरी है परम के प्रति श्रद्धा भाव, उसमें मन पूरी तरह सुरक्षित रहता है और बुद्धि को क्यों खुला छोड़ दें उसे भी परम को अर्पित कर दें तो हम पूर्णतया सुरक्षित हो जाते हैं. अन्यथा मन व बुद्धि को चुराने के लिए सारा जगत है, या तो मन चंचलता के कारण स्वयं ही भटक जायेगा. इसलिए अपना मन व बुद्धि ईश्वर के पास रख देने में ही लाभ है. कोई भी अन्यथा भाव तब मन में टिक ही नहीं पाता, परम की स्मृति उसे हटा देती है.

Monday, September 26, 2011

भक्ति मार्ग


मार्च २००२ 
भक्ति मार्ग सरल है, लेकिन भक्ति उसी के हृदय में पल्लवित होगी जो स्वयं भी सरल है. भगवद् गीता में भगवान कृष्ण का वचन है कि निराकार की अपेक्षा साकार की पूजा करना साधक को शीघ्र प्रगति प्रदान करता है. अचिन्त्य, अव्यक्त, निराकार की अपेक्षा मनमोहन का सुहावना रूप हृदय को शीघ्र एकाग्र करता है. भक्ति मार्ग में हमें कुछ छोड़ना नहीं पड़ता बल्कि इष्ट को मन से जोड़ना होता है. धीरे-धीरे मन स्वयं ही व्यर्थ के कार्यों से विरक्त होता जाता है, आत्म ज्ञान प्रकट होता है. और इस सत्य की अनुभूति भी होती है कि हम नश्वर देह नहीं हैं ईश्वर के अविनाशी अंश हैं.