Friday, November 11, 2011

शाश्वतता


पांच शरीर हैं हमारे, पांचों के पार वह चिदाकाश है जहाँ हमें पहुंचना है. सत्य को चाहने पर ही सत्य की यात्रा होगी. परमात्मा न जाने किस-किस उपाय से हमें उसी ओर ठेल रहा है, वह हमें सुख-दुःख के द्वंद्वों से अतीत देखना चाहता है. हमारे अहं को क्षत-विक्षत करता है. हम उसे तभी जान सकते हैं जब भीतर अहं न हो. शाश्वत को जानने और मानने की मति भी वही देता है. नश्वरता को अपनाएंगे तो वही मिलेगी, और मन पुराने संस्कार जगाता ही रहेगा. जब हम उसकी निकटता में रहते हैं, उसके सामीप्य का अनुभव करते हैं, तभी आकाश की भांति पूर्ण मुक्त, स्वच्छ और अलिप्त रहेंगे.

Wednesday, November 9, 2011

समर्पण


जून २००२ 

आज पूर्णिमा है. हमारे हृदय गगन में भी परमात्मा रूपी चन्द्रमा का आगमन हो ऐसी कामना करनी चाहिए. मन शांत हो, ध्यानस्थ हो, परमात्मा की छवि हटे नहीं. सुमिरन अपने आप चलता रहे. सत्य को छोडकर कोई विचार मन में न टिके. एक उसी की याद हर वक्त बनी रहे और तब एक ऐसी गहराई का अनुभव होता है जैसे सब कुछ ठहर गया हो. सारा जगत स्थिर हो मन की तरह, कहीं कोई उहापोह नहीं विक्षेप नहीं. अद्भुत है वर्तमान का यह क्षण. हमारे और उसके बीच अभिमान का झीना सा पर्दा ही तो है, इसे हटा दें तो ही पूर्ण समर्पण संभव है. 

Monday, November 7, 2011

परमात्मा प्रेम है


जून २००२ 
हर हृदय में परमात्मा का वास है. होश में रहें तो दुःख पास नहीं फटकता और यदि कोई भाव ऐसा उठा भी तो होश में उसे देखा जा सकता है साक्षी बन कर, उसी क्षण वह अपनी ऊर्जा खोने लगता है. जैसे हमें यदि अनुभव हो कि कोई देख रहा है तो हमारा व्यवहार बदल जाता है वैसे ही भीतर के भाव देखने मात्र से बदलने लगते हैं. हमारे स्वप्न भी सचेत करते हैं कि परमात्मा से जो आनंद हमें मिला है उसे छोटे-छोटे सुखों के पीछे गंवा न दें. यदि हमारी निष्ठा सच्ची हो तो परमात्मा की ओर से देरी नहीं है. वह प्रेम का इतना अधिक प्रतिदान देते हैं कि मन छलक-छलक जाता है. यह सारा विश्व उसी एक का विस्तार है. उस एक की शक्ति हर ओर बिखरी है. जिसके मूल में प्रेम है, निष्काम प्रेम. यह संसार प्रेम से ही बना है प्रेम से ही टिका है और उसी में स्थित है. 

Saturday, November 5, 2011

भीतर का मौसम


जून २००२ 

बाहर के मौसम के मिजाज तो बदलते रहते हैं, हमें अपने अंदर वह धुरी खोज निकालनी है जो अचल है, अडिग है जिसका आश्रय लेकर हम दुनिया में किसी भी ऊंचाई तक पहुँच सकते हैं. जो मुक्त है, शुद्ध प्रेम स्वरूप है, उसी को पाने के लिये भीतर की यात्रा योगी करते हैं. स्थिर मन ही हमें उस स्थिति तक ले जा सकता है और मन की स्थिरता ध्यान से आती है. वहाँ एक बार जाकर लौटना नहीं होता, हम जीतेजी पूर्णता का अनुभव करते हैं. प्रकृति के सान्निध्य में अथवा पूजा के क्षणों में अभी भी हम कभी-कभी ईश्वर की झलक पाते हैं पर यह अस्थायी होती है, संसार पुनः हमें अपनी ओर खींच लेता है. 

Friday, November 4, 2011

अनन्तता


जून २००२ 

ईश्वर हर क्षण हमारे साथ है. वह कितने विभिन्न उपायों से अपनी उपस्थिति जता रहा है. प्रेरणादायक वचन सुनने को मिलते हैं, सारी बातें जैसे किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हमारे जीवन में सही समय पर आने लगती हैं. वस्तुएं अपने वास्तविक रूप में प्रकट होना चाहती हैं. आवरण हटता जा रहा है. हमें पूर्ण सहयोग देना है. शुभ संकल्प करके मन को स्थिर रखना है. सत्य को धारण करने के लिये मन को खाली रखना है. कामनाएं कम हों और धीरे-धीरे समाप्त होती चली जाएँ, क्योंकि इनमें सार नहीं है. जो सुख इनसे हमें मिलता है वह क्षणिक होता है. किन्तु आध्यात्मिक सुख अनंत है. वह हमारे निकट से भी निकटतर है, केवल मिथ्या अहंकार का आवरण हमारे और उसके बीच है. हमने अपनी जो छवि अपनी दृष्टि में बना ली है वह असत् है. देह, मन, बुद्धि व अहंकार से परे हम शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा हैं जिसमें हमें स्थित होना है. 

Thursday, November 3, 2011

उसका पथ


जून २००२ 
आध्यात्मिक मार्ग पर चलना ही हमारी नियति है. हम सभी किसी न किसी रूप में इसी मार्ग के राही हैं. कोई अन्जाना है और कोई सचेत होकर चल रहा है. नित नए अनुभव होते हैं इस मार्ग पर, जैसे पहले से ही तय हों. कभी कभी ऐसा लगता है कि कोई आश्वासन दे रहा है कि सब कुछ सही समय पर होगा, ठीक होगा. किसी इच्छा का पूरा होना या न होना दोनों में कोई फर्क नहीं रह जाता. संसार का कोई भी सुख उतना आकर्षित नहीं करता जितना कि ईश्वर का विचार और उससे मिलने की ललक.  वही जैसे हमारा मार्ग निर्देशित कर रहे होते हैं, तभी तो समय भी है, शास्त्र भी हैं, सदगुरु भी हैं सभी कुछ हमारे अनुकूल कर दिया है. जिसकी स्मृति ही मन को इतनी सौम्यता से भर देती है उसका साक्षात्कार कितना अभूतपूर्व होगा, यह बात ही पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है.

Tuesday, November 1, 2011

कर्म बंधन


जून २००२ 
ध्यान तभी टिकता है जब मन अन्तर मुख होता है. देह के ममत्व से ऊपर उठता है. विचार शून्यता की स्थिति तभी आती है. ध्यान बोध को जगाने के लिये है. सचेत मन को हटाने के लिये है. ध्यान से बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है इसी प्रज्ञा के दर्पण में आत्मा का दर्शन होता है. ध्यान हमें मन में उठने वाले विचारों के प्रति सजग करता है. प्रत्येक कर्म पहले विचार के रूप में जन्म लेता है उसी रूप में यदि उसे शुद्ध कर लिया जाये तो कर्म भी शुद्ध होंगे और हम कर्म बंधन में नहीं पडेंगे.