हम देह को
स्वस्थ रखने के लिए पौष्टिक भोजन ग्रहण करते हैं, व्यायाम और योग साधना करते हैं.
मन के विश्राम के लिए हम निद्रा की शरण लेते हैं, उसे प्रसन्न रखने के लिए मनोरंजन
के साधन का उपयोग करते हैं. भावनात्मक आवश्यकताओं के लिए परिवार, समाज और रिश्तों
का आश्रय लेते हैं. हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए हर कोई अपने तौर पर किसी न
किसी प्रयास में लगा है. यह सब करते हुए हम एक आवश्यक बात भुला देते हैं कि हमारे
हर विचार का असर हमारे भाग्य पर पड़ता है. विचारों से हमारा दृष्टिकोण तथा मान्यतायें
बनती हैं, जिससे हमारी आदते विकसित होती हैं, तथा व्यक्तित्त्व बनता है. प्रतिदिन
कुछ समय निकाल कर अपने भविष्य की कल्पना
करने तथा उसके अनुरूप चिन्तन करने से हम अपना भाग्य स्वयं ही बदल सकते हैं.
Thursday, December 17, 2015
Thursday, October 29, 2015
सुख का सागर लहराता है
ऐसे तो हर
कोई सुख की खोज में लगा है पर जो सचेतन होकर सुख की तलाश में निकलता है वह एक दिन
स्वयं को सुख के सागर में पाता है. सुख की तलाश जब सजग होकर की जाती है तो उसका
पता पूछना होगा, जो भी ऐसे कारण हैं जो सुख को दूर करते हैं उन्हें मिटाना होगा.
सजगता ही वह सूत्र है जो किसी को भी मंजिल तक पहुंचा सकती है. इसका सबसे बड़ा कारण
है कि सुख को बनाना नहीं है वह तो मौजूद है, अनंत मात्रा में मौजूद है, जरूरत है
उसका पता पूछकर उस दिशा में कदम बढ़ाने की.
Monday, October 26, 2015
एक शिवालय है यह तन
मानव देह
परमात्मा का मन्दिर है, देह में ही परमात्मा का अनुभव सम्भव है. मन मनुष्य निर्मित
है, देह नैसर्गिक है. मन बंटा है, अशान्ति मन के कारण है. मन समाज का दिया है, तन प्रकृति
का है, हर पल परमात्मा से जुड़ा है, प्राण जो इस देह को चला रहे है, पंच तत्व जिनमें
परमात्मा ओतप्रोत है, जिनके स्पर्श से भीतर पुलक भर जाती है, इस देह द्वारा ही
अनुभव में आते हैं. इसीलिए संतजन कहते हैं स्वयं को जानो, स्वयं के पार ही वह छुपा
है जिसे जानकर फिर कुछ जानने को शेष नहीं रहता.
Monday, October 5, 2015
ज्ञान भक्ति दोनों ही तारें
मानव जीवन दुर्लभ है,
इसी में कोई सारे दुखों से छुटकारा पा सकता है. ऐसा सुख पा सकता है जो कभी जाता
नहीं है. सुबह से शाम तक किस-किस को दुःख दिया अथवा दुःख देने की भावना की, रात को
सोने से पूर्व इसका लेखा-जोखा कर लें तो धीरे-धीरे कर्म बंधन कट जाते हैं. व्यवहारिक
सत्य-असत्य का ज्ञान होने पर भीतर आग्रह नही रहता. जब एक-दूसरे के दृष्टिकोण को
नहीं समझते तब ही कर्म बंधते हैं. ज्ञान मुक्त कर देता है. किसी को दुःख पहुंचाना
पाप है और किसी को सुख पहुंचाना पुण्य है. दुःख पहुँचाने से यदि हृदय में पश्चाताप
हो तो पाप कट जाता है. भक्ति का खजाना जिसके हृदय में भरा हो, उसे जग से क्या
चाहिए. यह खजाना ऐसा है जो कभी खत्म नहीं होता.
Tuesday, September 29, 2015
मुक्त हुआ मन उड़े गगन में
ज्ञान मन को मुक्त कर देता है. आत्मा का
ज्ञान पाकर ही बुद्धि वास्तव में बुद्धि कहलाने की अधिकारिणी है. उसके पहले मन तो पाश
में बंधा होता है, बुद्धि भी एक अधीनता का जीवन जीती है. मन की आधीन, इन्द्रियों
की आधीन, धन, प्रसिद्धि, प्रशंसा की आधीन, मोह, क्रोध, अहंकार की आधीन तथा और भी न जाने मन की कई सुप्त
प्रवृत्तियों की अधीनता उसे स्वीकारनी पड़ती है. किन्तु आत्मा का ज्ञान होने के बाद
जैसे कोई परदा उठ जाता है. मन, बुद्धि स्वयं को कितना हल्का महसूस करते हैं.
Monday, September 21, 2015
सांचा तेरा नाम..
कृष्ण व्यापक है, परम सत्य व्यापक है
किन्तु मद तथा मूढ़ता के कारण हम उसे देख नहीं पाते. जब हम सत्य की खोज में निकलते
हैं तो मन भटकाता है, हम केंद्र से दूर हो जाते हैं. सत्य खोजने से नहीं मिलता
बल्कि हम जहाँ हैं वहीं उसे प्रकट कर सकते हैं. सत्य शास्त्र से भी नहीं मिलता,
शास्त्र उसका अनुमोदन भर करते हैं. जब-जब हम धर्म के मार्ग पर चले हैं, उसी में
स्थित हैं. ईश्वर हमसे दूर नहीं है, वह तो निकटस्थ है, चाहे हम उसे याद करें अथवा न
करें, वह हमारी आत्मा की भी आत्मा है.
Tuesday, September 1, 2015
रुक जाये पल भर को मन
जगत आश्चर्यों से भरा
है..यह सृष्टि अनोखी है. हजारों तरह के फूल, रंग-बिरंगी तितलियाँ, सुंदर मछलियाँ,
उगता हुआ सूर्य, रात्रि के नीरव आकाश में लाखों सितारे..और उन सबसे बढ़कर मानव का मन-मस्तिष्क. जिसमें न जाने कितने जन्मों की
स्मृतियाँ और संस्कार अंकित हैं. जिन्हें हम स्वप्न के रूप में देखते हैं. इन सबको
देखने वाला द्रष्टा जब विस्मय से भर जाता है तो स्तब्ध रह जाता है, विस्मय से भरा
मन कुछ पल के लिए ही सही थम जाता है और तब उसे उसका पता चलता है जो इन सबको देख
रहा है, वही हम हैं. यह सृष्टि मानो हमें आश्चर्य चकित करने के लिए ही बनाई गयी है
ताकि हम खुद को पा सकें उन क्षणों में जब बाहर की विविधता हमें स्तब्ध कर दे.
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