Thursday, July 5, 2018

जिन खोजा तिन पाइयाँ


५ जुलाई २०१८ 
हमारे जीवन में बाहर की परिस्थतियाँ कैसी भी हों, हरेक के भीतर परमात्मा एक सा समाया है. जैसे आकाश सबको एक सा दीखता है, सूर्य रश्मियाँ, हवा और जल किसी के प्रति भेदभाव नहीं करते वैसे ही सबके भीतर चेतना का स्रोत एक ही है. जैसे सागर देखने सब जाते हैं, पर कोई लहरों से भयभीत होकर उसके निकट तक नहीं जाता, कोई गोता लगाकर मोती खोज लाता है, उसी तरह हम अपने विचारों और भावनाओं की लहरों को देखकर ही खुद को जान लिया समझ लेते हैं, और कोई संत गहरे जाकर सत्य का मोती खोज लेता है. जैसे सागर सब नदियों का स्वागत करता है और खारे  जल को मुक्त करके मीठा बनाकर पुनः उन्हें लौटा देता है, परमात्मा हमारे विचारों और भावों को समा लेता है और परिवर्तित कर नये रूप में लौटा देता है.

Tuesday, July 3, 2018

जीवन चलने का नाम


३ जुलाई २०१८ 
जीवन एक यात्रा है, यह वाक्य हमने न जाने कितनी बार सुना है. संत कहते हैं, हम इस जगत में कहीं और से आये हुए यात्री हैं, दो-चार दिन यहाँ गुजार कर हमें वापस जाना है. इन बातों में एक गहरी सच्चाई है, इसका अनुभव किसी को तब होता है जब वह कोई यात्रा कर रहा होता है. घर से दूर किसी नये शहर में जाकर हम कितनी सजगता से वहाँ के दर्शनीय स्थलों को देखते हैं, आने वाली तकलीफों को भी मुस्कुराते हुए झेल लेते हैं. मित्रों के यहाँ जाने पर कितना प्रेम जताते हैं. मन सदा ही एक ‘मगन भयो’ की भाव मुद्रा में रहता है. हम यहाँ घूमने आये हैं, रहने नहीं, यह भाव जगा रहता है तो न कोई राग सताता है न ही द्वेष, कोई असुविधा भी हो तो यह याद आ जाता है, कौन सा हमें यहाँ सदा रहना है, एक यात्री का मन सदा उत्सुकता से भरा होता है, जंगल घूमने गया हो तो एक चिड़िया या एक हिरन की झलक भी उसे ख़ुशी से भर जाती है. इन सबके पीछे कारण होता है कि मन में मोह व ममता नहीं होती. यह जगत भी ऐसे ही हमारे विहरने का स्थान मात्र है, यह हमारा कोई स्थायी पता नहीं है. मोह-ममता के बिना मन कितना हल्का रहेगा, इसकी कल्पना ही कितनी सुखद जान पडती है.   

Saturday, June 23, 2018

वृद्ध वही जो पूर्ण तृप्त हो


२३ जून २०१८ 
समय की धारा निरंतर बह रही है. जो आज अंकुर है, कल पौधा बनेगा, परसों वृक्ष और एक न एक दिन काल के गाल में समा जायेगा. किन्तु उससे पूर्व कितने फल-फूल उसकी शोभा बनेंगे, अनगिनत पंछियों का आश्रयस्थल वह वृक्ष बनेगा. कितने घरों के द्वार दरवाजे उसकी लकड़ी से आकार ग्रहण करेंगे. उससे उत्पन्न बीज नये अंकुर बनेंगे, और एक चक्र पूर्ण हो जायेगा. मानव का जीवन भी एक वृक्ष की भांति ही होता है, शिशु रूप में जो कोमल है, युवा होकर वही कितने उत्तरदायित्व सम्भालता है. अपने इर्द-गिर्द के वातावरण को विभिन्न रूपों से प्रभावित करता है. उसके सम्पर्क में आने वाले अनेकों व्यक्तियों को चाहे वे परिवार के सदस्य हों अथवा मित्र, या कार्यक्षेत्र के सहकर्मी सभी से विचारों और भावनाओं का आदान-प्रदान करता है. प्रौढ़ावस्था को पार करके एक दिन वही वृद्ध हो जाता है और जो सबको आश्रय देता था स्वयं को शक्तिहीन समझने लगता है. वृद्धावस्था में भी जो व्यक्ति नियमित दिनचर्या को अपनाकर, कुछ न कुछ शारीरिक और मानसिक श्रम करके स्वयं को व्यस्त बनाये रखता है और सदा प्रसन्न रहता है, उसका मन बालवत् हो जाता है. बालक कुछ न कुछ नया सीखने को उत्सुक रहता है, जीवन का हर दिन उसके लिए नई उम्मीद और नई चुनौती लेकर आता है. वृद्ध भी यदि अंत तक अपने भीतर के बालक को जीवित रखे और स्वयं को आने वाले भविष्य के लिए तैयार करता रहे तो उसकी यह अवस्था उसके लिए आनंद पूर्ण बन जाएगी.

Friday, June 22, 2018

करें योग रहें निरोग


२२ जून २०१८ 
कोई भी तनावग्रस्त व्यक्ति स्वयं के अस्तित्त्व को ही नहीं अपने चारों ओर के वातावरण को भी दूषित करता है, इसी तरह यदि कोई व्यक्ति शांत होता है तो शांति की लहरें उस तक ही सीमित नहीं रहतीं आस-पास के वातावरण को भी प्रभावित करती हैं. बिखरते हुए समाज को जोड़ने का काम योग से ही हो सकता है. भारत के संतों तथा प्रधानमन्त्री के कारण योग दिवस के रूप में विश्व को वर्ष में एक दिन ऐसा मिला है जिसको हर व्यक्ति मना सकता है. बच्चे, युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर सभी किसी न किसी रूप में इस दिन अपने तन, मन और आत्मा के पोषण के लिए कुछ समय निकाल सकते हैं. आज जब कि संसार के सभी देश किसी न किसी समस्या से ग्रस्त हैं, योगदिवस पर लाखों लोगों ने आसन, प्राणायाम किये, ध्यान किया, जिसके परिणाम स्वरूप समाज, देश और दुनिया में सकारात्मक ऊर्जा की लहर फैली है.

Monday, June 18, 2018

तोरा मन दर्पण कहलाये


१८ जून २०१८ 
मन जल की तरह है, तभी तो वह जिस वस्तु में प्रवेश करता है उसी का आकार धारण कर लेता है. मन यदि कठोर हो जाये तो बर्फ जैसा हो जाता है, और क्रोधित हो जाये तो वाष्प जैसा. दोनों ही स्थितियों में वह अपना स्वभाव खो देता है. मन में यदि कोई विकार आ जाये तो भी वह अपनी सहजता खो देता है. जल नीचे की और बहता है, मन यदि अमानी होकर रहे तो स्वभाव में टिका रहेगा, अन्यथा असहज हो जायेगा. सम्मान की कामना ही मन को स्वभाव से दूर कर देती है, जबकि स्वभाव में ही विश्राम है. जल जीवन का प्रतीक है. इसी तरह चेतन सत्ता का जब प्रकृति के साथ संयोग होता है, मन के रूप में ही उसकी उपस्थिति का ज्ञान होता है, अर्थात जीवन की अभिव्यक्ति मन के द्वारा ही होती है. मन को समझ कर जो इसके पार देखने में सक्षम हुआ वही इसे सदा दर्पण की भांति चमकता हुआ देखना चाहता है.

Friday, June 15, 2018

'मैं' को नहीं मुक्ति है 'मैं' से


१५ जून २०१८ 
एक व्यक्ति एक संत के पास गया और मुक्ति का मार्ग पूछा. संत ने कहा, सजगता में ही मुक्ति है. क्योंकि बंधन सदा ही असावधानी में बंधता है. असावधानी वश जो भी कार्य देह द्वारा होते हैं, उनके पीछे एक खोया हुआ मन होता है, मन के पीछे सुप्त बुद्धि होती है और होता है अहंकार. अहंकार कभी अपने को गलत नहीं मान सकता, भले ही वह जान लेता है कि बुद्धि ने उचित निर्णय नहीं लिया, मन में सही विचार नहीं आया और कृत्य सही नहीं है, पर वह उसे किसी न किसी तरह सही सिद्ध करना चाहता है. इस प्रक्रिया में वह बंधन में बंध जाता है. अब यही अहंकार पीड़ित होकर मुक्ति के उपाय खोजता है. जब तक मन वर्तमान में नहीं होगा, बुद्धि सतर्क नहीं होगी, कर्म सही नहीं हो सकते. वर्तमान के क्षण में अहंकार को टिकने के लिए कोई जगह नहीं है, सजग बुद्धि को भी किसी की अनुशंसा नहीं चाहिए, यानि अहंकार की दाल वहाँ भी नहीं गलती, कर्म जब शुद्ध होते हैं तो उनसे किसी फल की आशा नहीं रहती, क्योंकि कर्म करते समय ही सुख का अनुभव होता है. कर्तापन के मिटते ही मुक्ति का अनुभव होता है.

Thursday, June 14, 2018

शक्तिस्रोत छुपा है भीतर


१५ जून २०१८ 
बाहरी साज-सज्जा कितनी भी शानदार हो यदि कोई घर भीतर से संवारा नहीं गया है तो उसमें रहने वाले स्वस्थ नहीं हो सकते. ऐसे ही हमारा मन यदि संसारी और किताबी ज्ञान से तो भरा हो पर भीतर से भीरु हो, भयभीत रहता हो, और संस्कारों का गुलाम हो तो आत्मा खिल नहीं सकती. बीज रूप में आत्मशक्ति सबके भीतर मौजूद है, उसे पनपने के लिए उर्वर भूमि चाहिए, ऐसा मन चाहिए जो तूफानों में भी अचल रहे, भक्ति की कल-कल धारा जिसमें बहती हो, शांति और आनंद से सुवासित पवन का जहाँ बेरोकटोक आवागमन हो. शांत और सुदृढ़ मन में ही आत्मा का तेज धारण करने की शक्ति हो सकती है. ऐसा मन जो जगत को साक्षी भाव से देखता हो, दर्पण की तरह जिसमें कोई प्रतिबिम्ब ठहरता न हो, जो अछूता ही रह जाता हो. ऐसे मन में ही उस ज्योति की झलक मिलती है. एक बार स्वयं का परिचय हो जाने के बाद मन परम के प्रति झुकने के साथ-साथ हर क्षण स्वयं को शक्तिशाली अनुभव करता है.