हमें पर्वत की भांति अडोल होना है और यह भाव आत्मज्ञान से आता है. हमें अपने मन को अपने से पृथक देखना है. उसे साधन मानते हुए शुद्ध करना है. धीरे धीरे हम एक अद्भुत शांति का अनुभव करते हैं..आत्मभाव में कितना सहज सुख है. देह, मन व बुद्धि से स्वयं को संयुक्त करके हम व्यर्थ ही अपने को सुखी व दुखी मानते हैं जबकि संसार की किसी भी वस्तु में यह सामर्थ्य नहीं जो हमें थोड़ा सा भी कष्ट पहुँचा सके. साधन स्वरूप मन व बुद्धि तो हमें इस सुंदर सृष्टि का ज्ञान प्राप्त करने के लिये मिले हैं न कि दुखों का अम्बार ढोने के लिये.
Friday, December 30, 2011
सत्य की चाह
संत तुकाराम जी के जीवन पर आधारित घटनाओं को पढ़ने से पता चलता है कि उन्होंने काफ़ी कष्ट झेले. आग में तप कर ही सोना निखरता है. अंगुलिमाल की कथा पढ़कर भी भीतर कैसा विस्मय भर जाता है. हमारा अतीत चाहे जैसा भी हो यदि सत्य की चाह भीतर जग जाये तो ईश्वर तत्क्षण हमारा हाथ पकड़ लेते हैं. अतः अतीत में न रहकर वर्तमान में रहने का उपदेश हमें संत देते हैं. कर्म के सिद्धांत के अनुसार हम यदि इसी क्षण से सुकृत करें तो भविष्य सुधार सकते हैं. पिछले कर्मों का फल सहज भाव से स्वीकार करने का सामर्थ्य भी ईश्वर हमें देते हैं. फिर कष्ट कष्ट कहाँ रह जाता है. साधक अपने मार्ग तय कर लेता है. बल्कि देखा जाये तो ईश्वर ही उसका मार्ग तय कर देते हैं. मन में जो थोड़ी बहुत आशंका होती है कृपा उसे भी मिटा देती है. और तब सत्य ही एकमात्र उसके जीवन का केन्द्र बन जाता है. वह उसका हाथ पकड़ता है और ईश्वर उसका.
Thursday, December 29, 2011
जाना है उस पार
अगस्त २००२
ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. कितनी सुंदरता छिपी है हमारे भीतर, ईश्वर जहाँ है वहाँ तो सौंदर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इनसे बल मिलता है. सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है, शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. वह शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाता नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है.
Tuesday, December 27, 2011
साधना पथ
अगस्त २००२
मन को नवीनता चाहिए सो ईश्वर की भक्ति के लिये जप, तप, ध्यान, सुमिरन, कीर्तन, स्वाध्याय आदि अनेक उपाय शास्त्रों में सुझाये हैं. हर तरह की मानसिकता वाला व्यक्ति इस मार्ग पर चल सकता है, लेकिन सभी में उसे जानने की कामना तो होनी ही चाहिए. यह कामना सत्संग सुनने से भी उत्पन्न हो सकती है, अथवा शास्त्रों के अध्ययन से भी. यह भी आवश्यक नहीं कि सभी उसके बारे में एक जैसी अवधारणा रखें. कोई परम शक्ति, अन्य परम ज्ञान या परम आनंद के रूप में उसकी कल्पना करता है. उसे जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उस एक को जान कर सब कुछ जाना जा सकता है. वरना तो ज्ञान की इतनी शाखाएँ हैं और कई तो एक दूसरे का विरोध करती हुई प्रतीत होती हैं. यहाँ कुछ भी चिरस्थायी नहीं है. पल-पल हम मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं, न जाने कितने लोग हमारे देखते-देखते काल के गाल में समा गए, उनका कोई निशान भी नहीं बचता. वे एक से एक बड़े ज्ञानी थे, वैज्ञानिक थे, कलाकार थे, सामान्य जन थे. मृत्यु से पूर्व यदि इस रहस्य से पर्दा उठे कि हम यहाँ क्यों हैं? यह संसार क्या है? हमें बार-बार इस सुख-दुःख के झूले में क्यों झूलना पड़ता है? आदि, संभवतः इन सबका ज्ञान तो बहुत बाद में होगा किन्तु इस पथ पर चलते समय भी अनेक अनुभव होते है. चित्त को शुद्ध करने का प्रयास करते-करते समता भाव सधता है. प्रेम का शुद्ध स्वरूप निखरता है, ऐसा प्रेम जो स्वार्थी नहीं है, कल्याणकारी है, जो देना ही जानता है. मन की शांति भी तो एक अनुपम उपहार है.
Monday, December 26, 2011
सत्य की डगर
अगस्त २००२
सत्य के पथ पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान है, पग-पग पर चोट खाने का अंदेशा रहता है. थोड़ा सा भी अचेत हुए तो कभी अहंकार आकर अपनी छाया से ढक लेता है और कभी क्रोध ही अपने फन उठा लेता है. जो अनुभव पहले किये थे सारे हवा हो जाते हैं और मन एक बार फिर अपने को पंक में सना पाता है. कमलवत् जीवन के सारे ख्वाब बस ख्वाब ही रह जाते हैं. हृदय से यदि भगवद् स्मृति एक पल के लिये भी न हटे तो हम मुक्त ही हैं. लेकिन ऐसी स्थिति आने से पूर्व सजगता खोनी नहीं है, यह महासंकल्प ही हमें उबारेगा. अन्यथा कौन हमें मार्ग दिखायेगा. हमारे अमर्यादित संकल्प ही हमें दुःख के भागी बनाते हैं. जीवन को यदि एक दिशा दे दी है तो जो भी कार्य उस दिशा से विमुख करने वाले हैं उन्हें त्याग देना ही ठीक है. ‘अगर है शौक मिलने का तो हरदम लौ लगाता जा’... .एक उसी की लौ अगर दिल में हो तो वहाँ अंधकार कैसे आ सकता है.
Sunday, December 25, 2011
परम आकाश
अगस्त २००२
वह परमात्मा जिसे लोग मंदिरों में तलाशते हैं, मन के मंदिर में ही मिल सकता है. भक्त को वह अपने हृदय में प्रतीत होता है. वह भक्त को निर्देश देता है, प्रेम देता है, आनंद और ज्ञान देता है. उच्च मनोभूमि पर स्थापित करता है, द्वन्दों से परे ले जाता है, आकाश की तरह मुक्त वह परमात्मा स्वयं सच्चिदानंद है, उसकी अनुभूति होने के बाद संसार का सुख मृगतृष्णा की भांति प्रतीत होता है. भीतर का सुख शाश्वत है, असीम है, अपरिवर्तनीय है. जहाँ कोई रुकावट नहीं, कोई उहापोह नहीं, कोई चाह नहीं, कोई अपेक्षा नहीं. वह शाहों का शाह जब दिल में बसता हो तो और कुछ चाहने योग्य बचता भी कहाँ है. वह जिसका मीत बना हो उसका शोक सदा के लिये हर लिया जाता है. जीवन उत्सव बन जाता है. भक्ति, प्रेम और ज्ञान ही जीवन को तृप्त कर सकते हैं, इसका पता चलने पर अपनी कमियों को दूर करने की समझ भी बढ़ती है और संकल्प का बल भी मिलता है. एक छोटी सी किरण भी यदि उस परम की भीतर मिल जाये तो राह मिल जाती है.
Thursday, December 22, 2011
व्यक्ति व समाज
अगस्त २००२
आध्यात्मिकता का एक बड़ा उद्देश्य है लोक संग्रह यानि सेवा, अन्यों के जीवन में हम यदि खुशी का संचार कर सकें, प्रेम व भाईचारे का संदेश दे सकें तो समाज के ऋण से कुछ हद तक तो मुक्त हो सकते हैं. एक व्यक्ति समाज से कितना कुछ लेता है उसका शतांश भी वह लौटा सके तो उसका कितना भला होगा. सब ओर शांति का संदेश फैले, हमारा योगदान भी उसमें हो, ऐसा विचार ही मन-प्राण को ऊर्जा से भर जाता है. मन प्रमादी न ही, छल न करे न खुद से न औरों से, तो वहाँ प्रेम टिकता है और जो हमारे पास ज्यादा हो वही तो हम बाँट सकते हैं. परमात्मा के नाम का उच्चारण इसमें सहायक होता है. वह हमारे साथ है इस का दृढ़ विश्वास हमें हर द्वंद्व से मुक्त करता है.
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