Friday, December 30, 2016

जाना है माया के पार

३१ दिसम्बर  २०१६ 
वेदांत दर्शन के अनुसार जीव, ब्रह्म और माया ये तीन ही तत्व हैं.  ब्रह्म माया पर शासन करता है और माया जीव पर. जब जीव भी माया के पार चला जाता है, ब्रह्ममय हो जाता है. अभी हम माया से बंधे हैं, माया का अर्थ है जगत के प्रति आसक्ति और मोह. हम जगत को अपने सुख-दुःख कारण मानते हैं. साधना करते -करते यह ज्ञान होने लगता है कि जगत नहीं हम स्वयं ही अपने सुख-दुःख के कारण हैं. यह ज्ञान होते ही या तो कोई आत्मग्लानि में चला जाता है अथवा तो प्रार्थना उसके जीवन में उतरती है. इसके बाद ही यह ज्ञान होता है कि यदि सुख-दुःख के कारण हम ही हैं तो उनसे मुक्ति भी हमारे हाथ में है, मुक्ति का बोध होते ही माया के पार जाकर ब्रह्म के साथ एकत्व का अनुभव होने लगता है. सतत साधना करते-करते यह अनुभव टिकने लगता है और तब कमलवत रहना सम्भव हो जाता है. नये वर्ष में प्रवेश करने से पूर्व क्यों न हम यह संकल्प लें कि आने वाले वर्ष में हम नियमित साधना करेंगे. 

संग संग वह हर पल रहता

३० दिसम्बर २०१६ 
परमात्मा सदा ही हमारे साथ है. किन्तु जैसे सूर्य उदित होने पर भी यदि हम घर के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करके बैठे रहें तो उसका ताप व प्रकाश अनुभव में नहीं आता, वैसे ही परमात्मा और हमारे मध्य जब मन अथवा संसार रूपी दीवार आ जाती है तो उसका अनुभव नहीं होता. ध्यान में जब उसमें विश्राम करते हैं तब जगत का लोप हो जाता है. पुनः मन, बुद्धि में आने पर भी उसकी स्मृति बनी रहती है. वह तो तब भी हमें देख रहा होता है. उससे ही हमारा हर श्वास चलता है, उससे ही हर भाव उत्पन्न होता है, वह हमसे पूर्व ही उसे जानता है. चित्त जब केन्द्रित होता है उसकी ही शक्ति समाहित हो रही होती है, जब व्यर्थ के संकल्प-विकल्प उठाता है तब उसी की ऊर्जा व्यर्थ बह रही होती है. जैसे किसी घट में छेद हो तो पानी नहीं टिकता, वैसे ही अस्थिर मन में ध्यान नहीं टिकता. नये वर्ष में क्यों न हम नियमित ध्यान करें.

Wednesday, December 28, 2016

नये वर्ष में नई दिशा

२९ दिसम्बर २०१६ 
कितना अच्छा हो यदि नये वर्ष में हम उन सारी तकलीफों, दुखों, परेशानियों से बचे रहें जो पिछले वर्ष में हमने किसी न किसी अंश में महसूस कीं और उन सारी खुशियों, मुस्कानों और मस्ती से भरा रहे जो पिछले वर्ष या उसके पहले के वर्षों में हमें मिलीं. ऐसा हो सकता है, यदि हम नये वर्ष का स्वागत उसी तरह करें जैसे कोई बच्चा हर नये दिन का करता है, बिना किसी अपेक्षा के और बिना किसी पूर्वाग्रह के..हर दिन एक ताजगी से भरा हो..बिलकुल अछूता और रहस्यमय..जीवन प्रतिपल नया हो रहा है, भगवान बुद्ध कहते हैं, कल बीत गया साथ ही कल जो व्यक्ति था वह भी बदल गया, इस बात को जो अनुभव से जान लेता है उसके जीवन से दुःख. शोक, उसी तरह विदा हो जाते हैं जैसे खरगोश के सिर से सींग. नया वर्ष एक नयी दिशा का प्रतीक बन सकता है और एक नये भविष्य का भी, यदि हम इसकी नूतनता को बना रहने दें.

Tuesday, December 27, 2016

तोरा मन दर्पण कहलाये

२८ दिसम्बर २०१६ 
मन उसी का नाम है जो सदा डांवाडोल रहता है, तभी मन को पंछी भी कहते हैं हिरन भी और वानर भी..आत्मा रूपी वृक्ष के आश्रय में  बैठकर टिकना यदि इसे आ जाये तो इसमें भी स्थिरता आने लगती है, वास्तव में वह स्थिरता होती आत्मा की है प्रतीत होती है मन में, जैसे सारी हलचल होती बाहर की है प्रतीत होती है मन में..मन तो दर्पण ही है जैसा उसके आस-पास होता है झलका जाता है. संगीत की लहरियों में डूबकर यह मस्त हो जाता है और किसी उपन्यास के भावुक दृश्य में भावुक..ऐसे मन का चाहे वह अपना हो या अन्यों का क्या रूठना और क्या मनाना...क्यों न नये वर्ष में मन को समझते हुए प्रवेश करें ताकि न किसी से मनमुटाव हो और न किसी का मन टूटे. आत्मा रूपी वृक्ष पर कुसुम की तरह खिला रहे सबका मन.

Monday, December 26, 2016

खिले ध्यान का कुसुम जहाँ

२६ दिसम्बर २०१६ 
इस जगत में आने से पूर्व हम अकेले थे और यहाँ से जाने के बाद भी अकेले होंगे, इस जगत में भी नींद में हम अकेले होते हैं. ध्यान इसी अकेले होने की किंतु परम के साथ होने की कला है. नींद में हम अनजाने में अस्तित्त्व के साथ होते हैं, हमें उसकी उपस्थिति का भान नहीं होता, बस जगने के बाद भीतर ताजगी का अनुभव होता है. ध्यान में बोधपूर्वक हम अस्तित्त्व के साथ हो सकते हैं और तब हमें सारी सीमाएं टूटती हुई लगती हैं. भीतर एक अचलता का पता चलते ही भय मात्र से मुक्ति का अनुभव होता है. 

Tuesday, December 20, 2016

पितृ देवो भवः मातृ देवो भवः

२१ दिसम्बर २०१६ 
माता-पिता चाहे वे उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों, बच्चों की सुख-सुविधा के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं. वे उन्हें सदा प्रसन्न देखना चाहते हैं. एक यही रिश्ता ऐसा है जहाँ  बेशर्त प्रेम, जिसका जिक्र हम सदा सुनते हैं, देखा जाता है. ऐसा करके वे प्रसन्नता का ही अनुभव करते हैं, किन्तु जब बच्चे इसे अपना हक समझते हैं और कृतज्ञता का अनुभव करना तो दूर, इसका अधिक से अधिक लाभ उठाने लगते हैं तो देखने वालों को विचित्र लगता है. कोई भी रिश्ता यदि संतुलित रहे तो फूल की तरह सुगन्ध फैलाता है और यदि एकतरफा हो जाये तो उसमें  सकारात्मक ऊर्जा नहीं रहती। सन्त कहते हैं यदि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा रखता है तो ईश्वर के प्रति प्रेम का बीज उसके भीतर पनपने लगता है. इसके विपरीत यदि कोई बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना से अछूता है तो परम के प्रति श्रद्धा और आत्मिक सुख से वह वंचित ही रह जाता है.

मर्म धर्म का जानेंगे जब

२० दिसम्बर २०१६ 
धर्म के जिस रूप को हम जानते और मानते हैं, जिसमें मूर्ति पूजा भी शामिल है और व्रत-उपवास भी, धार्मिक उत्सवों और कुछ रीति-रिवाजों का पालन भी, उससे हम वास्तविकता से दूर ही रह जाते हैं, स्वयं की वास्तविकता, जगत की वास्तविकता और परमात्मा की वास्तविकता इन तीनों से दूर. जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त हम किसी अज्ञात ख़ुशी की आशा किये चले जाते हैं, जो एक न एक दिन मिलने वाली है. जीवन एक उत्सव कम संघर्ष अधिक ज्ञात होता है. सुख की आशा में हम तात्कालिक दुःख को भी हँसते-हँसते झेल जाने को तैयार रहते हैं, किंतु सच्चा धर्म सदा के लिए हर दुःख से मुक्ति का मार्ग सुझाता है.