Sunday, November 20, 2011

मन व संसार


जुलाई २००२ 

जिस संसार के बारे में हम सुनते हैं कि यह असार है, अस्थिर है, पल पल बदलता है, वह कहीं बाहर नहीं हमारा अपना मन ही है. क्योंकि इस बाहरी जगत को हम अपने मन के माध्यम से ही जानते हैं जिसका जैसा स्वभाव है गुण हैं प्रकृति है संसार उसे वैसा ही नजर आता है. मन जिसे अपना मानता है उसे सुखी देखना चाहता है ताकि मन को खुशी मिले. मन जो करता है अपनी तुष्टि के लिये करता है. इसी मन को यदि अपने भीतर विवेक द्वारा नित्य-अनित्य का ज्ञान होता है तब यही मन भीतर जाने लगता है यानि संसार से परे सन्यास की यात्रा आरम्भ होती है. बाहर सब कुछ वैसा ही रहता है पर भीतर एक नया द्वार खुल जाता है. तब स्वयं की तुष्टि के लिये नहीं प्रेम के लिए प्रेम होने लगता है. क्योंकि इस तथ्य का ज्ञान होता है कि जो सदा आनंद में है वही आत्मा वह स्वयं है. 

Friday, November 18, 2011

प्रेम ही पूजा है


july 2002 
हृदय में श्रद्धा और विश्वास की पूंजी हो तो जीवन का पथ सरल हो जाता है, मात्र सरल ही नहीं  सरस भी हो जाता है. सामर्थ्य बढ़ जाता है, समर्थ वही है जो किसी भी देश, काल में अपनी आत्मा पर ही निर्भर रहे, अहंता व ममता छोड़कर श्रेय के पथ पर चले. एक बार ईश्वरीय प्रेम का अनुभव हो जाने के बाद वह कभी हमारा हाथ नहीं छोड़ता. बल्कि पग-पग पर ध्यान रखता है, इतने स्नेह से वह हमारी खोजखबर लेता है जैसे पुराना परिचित हो. इस जग में जितना प्रेम हमें मिलता है या हमारे हृदयों में अन्यों के लिये रहता है वह उसी के प्रेम का का प्रतिबिम्ब है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह हमारे सभी कर्मों का साक्षी है. उसे अर्पित करने के लिये इस जग के सभी पदार्थ तुच्छ हैं, एक मात्र प्रेमपूर्ण हृदय ही उसे समर्पित करने योग्य है, उसकी बनायी इस सृष्टि में हर कहीं उसे ही देखने की कला ही पूजा है.

स्वाधीनता


जुलाई २००२ 
ध्यान का मूलमंत्र है स्वाधीनता, साधक को धीरे धीरे किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर होना छोड़ते जाना होगा. पराधीनता हम स्वयं ही चुनते हैं, बंधन का दुःख भी सहते हैं. जितने जितने उदार हम होते जायेंगे, संग्रह की प्रवृत्ति घटती जायेगी, जीतेजी मुक्ति का अनुभव बढ़ता जायेगा. ध्यान का अर्थ है स्वयं पर लौट आना. जहाँ एकमात्र ईश्वर ही हमारी आशाओं का केन्द्र है. जो अखंड शाश्वत प्रेम का सागर है. जो मृत्यु के क्षण में भी हमारे साथ है और मृत्यु के बाद भी. उसकी आधीनता ही वास्तविक स्वाधीनता है.

Wednesday, November 16, 2011

आसक्ति


जुलाई २००२ 

हमारे दुखों का कारण है गहन आसक्ति, अन्यथा हम शाश्वत सुख के अधिकारी हैं. ईश्वर के सिवा इस जगत में कुछ भी शाश्वत नहीं है. आसक्ति मिटते ही मन विश्रांति का अनुभव करता है. जिससे सामर्थ्य की उत्पत्ति होती है, और सहज ही हम अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो जाते हैं व उन्हें करने में सक्षम भी होते हैं. दूसरों की पीड़ा में भागी भी हो पाते हैं. अंतर में प्रेम हो तभी यह संभव हैं, अन्यथा तो दूसरों की पीड़ा हमें ऊपर से छू कर निकल जाती है. स्वयं को यदि ज्ञान में स्थिर रखना है तो उसका लक्ष्य सबके प्रति प्रेम रखना होगा, अन्यथा यहाँ भी स्वार्थ ही है. अपनी आत्मा का विकास मात्र स्वयं के लिये, अपने सुख के लिये, नहीं, अपने ‘स्व’ का विस्तार करते जाना है, सबको अपना सा देखना है, तभी मुक्ति संभव है.

Tuesday, November 15, 2011

भक्तिभाव


जुलाई २००२ 

ज्ञान का अंत भक्ति है. भक्ति हमें आभामय, रसमय तथा मकरंद मय बनाती है. ईश्वर से लगी लगन  तारने वाली बन जाती है. देर सबेर सत्य का साक्षात्कार हो जाता है, मोहनिद्रा से सदा के लिये जागृति हो जाती है. भक्ति वर्तमान में ले जाती है. तमस व रजस से छुडाकर सत् में टिका देती है. लेकिन सात्विक सुख से भी बंधना नहीं है. भक्त अथवा साधक के सम्मुख एक मार्ग स्पष्ट होता है बस चलने भर की देर है. प्रेम का पाथेय लिये वह उस मार्ग पर निश्चिन्त होकर चल पड़ता है.

Monday, November 14, 2011

उदारता


july 2002 

जीते जी अगर परमात्म सुख का अनुभव करना हो तो पहले औदार्य सुख का अनुभव करना चाहिए. जो उदार होता है वह प्रेमी भी होता है. वह सामर्थ्य भी रखता है, सहज और सौम्य भी होता है. ईश्वर के निकट जाना है तो हम माँगने वाले नहीं देने वाले बनें. स्वार्थ ही हमें अपने सहज स्वभाव से दूर करता है. सहजता में भक्ति को प्रकट होते देर नहीं लगती. जटिल तो हमारा मन बनाता है स्वभाव को, व्यर्थ की कल्पनाओं, विचारों, भावनाओं में डूबकर. मन को यह तो पता नहीं कि कब क्या सोचना है और अगला विचार कहाँ से आने वाला है वह अपने को ही  नहीं जान पाता तो संसार की समस्याओं का निदान कैसे खोज सकता है. उसके लिये तो अपने शुद्ध स्वभाव में ही लौटना होगा. 

सत्यं, शिवं,सुन्दरं



जो अपने लिये सत्यं, शिवं और सुन्दरं के अलावा कुछ नहीं चाहता, प्रकृति भी उसके लिये अपने नियम बदलने को तैयार हो जाती है. जो अपने स्व का विस्तार करता जाता है, जैसे-जैसे अपने निहित स्वार्थ को त्यागता जाता है, वैसे-वैसे उसका सामर्थ्य बढ़ता जाता है. अस्तित्त्व पर निर्भर रहें तो कोई फ़िक्र वैसे भी नहीं रह जाती क्योंकि वह हर क्षण हमारे कुशल-क्षेम का भार वहन करता है. जैसे एक नन्हा बालक अपनी सुरक्षा के लिये माँ पर निर्भर करता है, हमारे सभी कार्य यदि हम उस पर निर्भर रहते हुए करेंगे तो उनके परिणाम से बंधेंगे नहीं. हम जो भी करें उसका हेतु सत्य प्राप्ति हो तो सामान्य कार्य भी भक्ति ही बन जाते हैं.